श्री किशोरी कृपा कटाक्ष

श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, श्री ललित लड़ैती द्वारा श्री राधिका महरानी की कृपा की याचना करते हुए पदों का संकलन है।

43 लेख उपलब्ध हैं

  1. बहुत दिवस देखे बिन बीते - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (86)

    हे ललित लाड़ैती श्री राधे! आपके दर्शन किए बिना बहुत दिन बीत गए हैं। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो और उसी के कारण आप मुझसे विमुख अथवा उदास हो गई हों, तो कृपापूर्वक उस अपराध को अब क्षमा कर दीजिए और मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए।

  2. करुणा करि वन वास दीजिए - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

    हे स्वामिनी! कृपा करके मुझे अपने निज धाम श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये। हे करुणामयी! क्या कारण है कि आपने मुझे अपनी स्मृति से विस्मृत कर दिया है? हा राधे! आपने मुझे अपने महल की टहल (सेवा) से क्यों वंचित कर दिया? मुझसे ऐसा कौन सा अपराध बन पड़ा है जिसे आपने अपने हृदय में धारण कर लिया है?

  3. देहु निकुंज निवास स्वामिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06)

    हे स्वामिनी! मेरी समस्त भूल-चूक और दोषों को त्यागकर, अपनी ओर (अपनी कृपा की ओर) देखते हुए मुझे निकुंज में वास प्रदान कीजिए। मैंने तीनों लोकों में तुम्हारी जोड़ी (अर्थात् श्री राधा-कृष्ण) के समान ऐसी ललित और मनोहारी जोड़ी न तो कभी सुनी है और न ही देखी है।

  4. लोक लाज कुल कान की - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (77)

    जब तक हृदय में लोक-प्रतिष्ठा और कुल की मर्यादा की ज्वाला दहकती रहती है, तब तक श्री राधा-कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम का प्राकट्य नहीं हो सकता।

  5. होरी में लाज न रहे प्यारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वर्षोत्सव पद (35)

    हे प्यारी! इस होली के उत्सव में अब लज्जा और संकोच का कोई स्थान नहीं रह गया है। वह रसिया (कृष्ण) डफली बजाते हुए घूम रहा है और प्रेम भरी (ठिठोली वाली) गालियाँ गा रहा है।

  6. भलें करो जप योग तप - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (106)

    भले ही कोई मनुष्य जप, योग, तपस्या, दान, धर्म, व्रत और नियमों में निरंतर लगा रहे, पर यदि हृदय में प्रभु के प्रति निष्कपट प्रेम का अभाव है, तो उसे स्वप्न में भी वास्तविक कल्याण, आंतरिक शांति और परम संतोष की प्राप्ति नहीं हो सकती।

  7. भानुनन्दिनी मो तन हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15)

    हे भानुनन्दिनी, श्री राधा! मेरी ओर कृपा-दृष्टि डालिये। विषय-वासनाओं से मेरा हृदय तप रहा है— अपनी कृपा-कटाक्ष का एक कण बरसा कर इसे शीतलता प्रदान कीजिए

  8. झूलत ये दोऊ रूप अपार - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (25)

    असीम रूप-सौंदर्य वाले श्री श्याम-श्यामा दोनों झूला झूल रहे हैं। वृषभानु सुता श्री राधा गोरी अत्यंत भोली हैं, और नंदकुमार अनुपम छवि के भंडार हैं।

  9. जापै चढ़े युगल को रंग - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (69)

    जिस पर युगल (श्री राधा-कृष्ण) का रंग चढ़ जाता है, वह उनके अंग-सौंदर्य को निहारकर त्रिभुवन की समस्त सुख-संपत्ति और वैभव को एक क्षण में ही विस्मृत कर देता है।

  10. वृन्दावन के वास की - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (9)

    मेरे हृदय की निरंतर यही कामना है कि मुझे श्री वृन्दावन में वास मिले, जहाँ मैं युगल सरकार श्री श्यामाश्याम की मनोहर छवि को निहारूँ और निकुंजों में उनके रसमय रास-विलास का साक्षात् दर्शन कर सकूँ।

  11. वृन्दावन सुख अन्त नहीं स्थल युगल निवास - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (6)

    सब रसों का सार रस, वृंदावन रस अनंत है क्योंकि यह युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण का नित्य निवास स्थान है। स्वयं भगवान श्री हरि भी, कमलापुर (वैकुंठ) में वास करते हुए, निरंतर ब्रज वास की आशा करते हैं।

  12. शाक पात वा कंद फल - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (6)

    जो भी भोजन प्राप्त हो, चाहे वह शाक, पत्र, कंद अथवा फल ही क्यों न हो, उसी में संतोष कर लेना चाहिए। परंतु श्री वृंदावन धाम को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि यह युगल विहार का सुंदर स्थल है । श्री धाम वृंदावन के वास की अद्भुत महिमा है।

  13. बस वृन्दावन धाम में जो चाहे विश्राम - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (8)

    जो जीव विश्राम चाहता है, वह वृंदावन धाम में निवास करे। कालिंदी (यमुना) के जल का पान करे और राधा-श्याम का नाम रटे ।

  14. हा हा मैं सब भाँति विगारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (4)

    मैंने सब प्रकार से बिगाड़ ली है । मैंने वेद-शास्त्रों की मर्यादा, संसार की लाज, और कुल की मान-मर्यादा, सभी का त्याग कर दिया है।

  15. धनि धनि धनि बृन्दाविपिन - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (5)

    श्री वृंदावन धाम धन्य-धन्य है, यह समस्त सुखों की खान है, जहाँ गौर-श्यामल वर्ण वाले, रसिकों के जीवन-प्राण, श्री राधा-कृष्ण सदा नित्य विहार में मग्न रहते हैं।

  16. माल खजाना हीरा मोती - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (22)

    श्री श्यामाश्याम के दिव्य प्रेम रस पर मैं सम्पूर्ण खजाना, हीरे-मोती क्षण भर में लुटा दूंगा। तीनों लोकों की राजसी संपदा को तुच्छ मानकर, अपने बाएँ हाथ से बहा दूंगा।