दोऊ जन क्रीडत हैं बन माँहि - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (720)
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) वृन्दावन में क्रीड़ा कर रहे हैं। चारों दिशाओं से उमड़ते-घुमड़ते हुए काले बादलों को देखकर उनके हृदय में आनंद समा नहीं रहा है।
श्री कृष्ण दास पुष्टिमार्ग या वल्लभ सम्प्रदाय के अष्टछाप कवि थे।
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युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) वृन्दावन में क्रीड़ा कर रहे हैं। चारों दिशाओं से उमड़ते-घुमड़ते हुए काले बादलों को देखकर उनके हृदय में आनंद समा नहीं रहा है।
वृषभानु की लाड़ली श्री राधा बसंत ऋतु में क्रीड़ा कर रही हैं, जहाँ उनके नवल प्रियतम श्यामसुन्दर भी विराजमान हैं। सखियाँ हर्ष से खिल उठी हैं। मृदंग, ताल और नगाड़े आदि वाद्य बज रहे हैं, और सुख की खान श्री राधा महारानी क्रीड़ा के लिए महल से बाहर पधारी हैं।
हे वृषभानु किशोरी श्री राधा! जिस क्षण आप नवल-वृंदावन की कुंज-वीथियों में गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण से मिलती हैं, उसी क्षण उनका चित्त और बुद्धि पूर्ण रूप से हरण कर लेती हैं।
श्री श्यामसुंदर हर्षोल्लास से भरकर श्री राधिका संग होली खेल रहे हैं। एक ओर गोपियों के दल उत्सुकता से जुटे हैं, तो दूसरी ओर ग्वालबालों का समूह चांचरी की ताल पर नृत्य एवं क्रीड़ा में मग्न है।
श्यामा श्याम मेरे हृदय को पूरी तरह भर देते हैं भले ही उनका नाम कैसे भी लिया जाए (चाहे श्याम श्यामा अथवा श्यामा श्याम)। श्यामा श्याम मेरे नेत्रों के लिए अत्यंत मनोहर दृश्य हैं।
तुम्हारी जैसी सुंदरता और कोई नहीं है। तुम्हारे अंग-अंग सुंदरता के सदन हैं। हे सखी, तुम्हारी चपल भौहें ऐसी अनियारी हैं कि तीनों लोक वशीभूत हो जाते हैं और उन पर शासन करती हैं।
श्री वृंदावन की माधुरी नित्य-नित्य ही नवीन रस को बरसाती है। श्री कृष्णदास जी कहते हैं कि रसिकों के संग के बिना इसे कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता।
हे गोपाल लाल, मेरी आँखों में गुलाल न डालो, क्योंकि ये सदैव तुम्हारे वदन-चंद्र को चकोर पक्षी की भांति निहारती रहती हैं।
श्री कृष्ण के कमल मुख के दर्शन करने से किसको तृप्ति हुई है ? अरे सखी, मेरी बात सुन, जब मेरे नेत्र उनकी रूप माधुरी के दर्शन में उलझ जाती है तो उन्हें अद्भुत सुख प्राप्त होता है।
हे श्री राधिका प्यारी! तुम्हारे नयनों पर बलिहारी जाता हूँ ! मोहन लाल श्री कृष्ण इन नैनों के रस से सदा भींजें रहते हैं एवं उनके ह्रदय को तुम्हारा नाम ही भाता है ।
हे प्यारी जू [श्री राधे], तुम्हारी चतुराई मैंने भली प्रकार से जान ली है । अपनी बौंहों के धनुष से नयनों के बाण चलाकर अपने प्रियतम गिरिधर लाल को तुमने अपने अनुराग रंग में रंगकर घायल कर दिया है ।
श्री रासबिहारी-बिहारिणी जू की बलिहारी है । श्री कृष्ण मरकत मणि हैं एवं श्री राधा स्वर्ण-मणि माला हैं जो श्री कृष्ण की ग्रीवा में ग्रंथित हैं ।
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे, तुम तो मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारी हो । मैं तो तुम्हारी ही शरण में हूँ, अत: मेरी ओर थोड़ा सा निहार कर हंस कर बोल लीजिए ।
हे प्रियतम! आपके मुखारविंद की अनुपम शोभा का वर्णन करने के लिए, मेरे नेत्रों को वाणी (जीभ) की शक्ति प्रदान कीजिये। मैं बस इतना ही वरदान माँगता हूँ कि मेरा प्रत्येक रोम आपके उस सांवले सलोने श्यामसुंदर के रूप के आनंद-रस का निरंतर पान करता रहे।
श्री राधिका सखी समूह को लिए मनमोहन श्री कृष्ण के संग नृत्य कर रही हैं । युगल जोरि श्री श्यामाश्याम प्रेम से भरकर एक-दूसरे को गलबाँही दिए हुए हैं ।
"मेरा हृदय गिरधर श्री कृष्ण की सुन्दर छवि पर अटका हुआ है। उनकी ललित त्रिभंग मनमोहक चाल एवं उनका सुन्दर चिबुक मेरे ह्रदय में बस गए हैं । [1]
गौर वर्ण कांति है जिनकी, ऐसी श्री राधिका जी ही ब्रज की चूड़ामणि हैं, जिन्होंने वृषभानु महल में नंदनंदन श्री कृष्ण के हृदय का हरण कर लिया है।
जिनके सिर पर मोर मुकुट विराजमान है, कानों में मकराकृत कुण्डल सुशोभित है और अलकें घुंघराली हैं, उन श्री कृष्ण की छबि बड़ी सुन्दर है।
यदि किसी वन में बसो हो तो वृंदावन में बसो, यदि गाँव में बसो तो नंद गाँव । यदि नगर में बसना हो तो मधुपुरी (मथुरा) और यदि तट पर विश्राम करना हो तो यमुना तट पर विश्राम करो ।
एक गोपी अपनी सखी से कहती है: हे सखी मैं क्या करूँ, श्री मदन मोहन जू की यमुना तट पर वंशी वादन का श्रवण कर मेरी सुध बुध ही खो जाती है ।