मन शिक्षा [बयालीस लीला]

मन शिक्षा श्री हित ध्रुवदास जी द्वारा लिखित बयालीस लीला नमक ग्रन्थ का एक भाग है। इसमें रस उपासक साधकों के मन को शिक्षा दी गयी है ।

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  1. प्रीतम हू कैं प्रन इहै प्रीति के बस ह्वै जाहिं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (57)

    प्रियतम श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की यही प्रतिज्ञा है कि वे सदा प्रेम के वशीभूत ही रहते हैं, किन्तु प्रेम से विहीन कोटि-कोटि धर्माचरण करने वालों की ओर दृष्टि उठा कर भी नहीं देखते ।

  2. अब लगि मन कीन्हौ सोई , जो जो कह्यौ तैं मोहि - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (5)

    हे मन ! अब तक तूने जो कहा, वही मैं करता रहा हूँ। अब तू मेरा इतना कहा मान ले कि तू श्री श्यामा-श्याम के चरणों का ध्यान-दर्शन करता रहेगा ।

  3. भक्त आहिं बहु भाँति के - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (25)

    भगवान के भक्त अनेक प्रकार के होते हैं और उनके भावों में भी अनेक भेद होते हैं—दास्य, सख्य आदि। इसलिए जो साधक भक्तों के इस तारतम्य को बिना समझे संग करता है, उसे पहले विवेकपूर्वक अपने भक्ति-भाव के अनुकूल संग चुनना चाहिए; अन्यथा अंत में उसे खेद ही प्राप्त होगा।

  4. मन गज तजि कै विषै मग - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (6)

    हे मन रूपी हाथी! विषयों (संसारिक भोगों) के मार्ग को छोड़कर अब युगल किशोर के रसमय भजन मार्ग पर चल। श्री राधावल्लभ लाल के बिना तेरा इस संसार में कोई भी अपना नहीं है।

  5. रे मन अरु सब छाँडि कै - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (7)

    हे मन! यदि तू सब ओर से सिमटकर कहीं अटकना अथवा स्वयं को स्थिर करना चाहता है, तो वह रमणीय स्थल श्री वृन्दावन की सघन कुंजें हैं, जहाँ रसिक-शिरोमणि श्यामा-श्याम नित्य विहार-परायण रहते हैं।

  6. मन तौ चंचल सबनि ते - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (14)

    यह मन सबसे अधिक चंचल है। इसकी चंचलता के निवारण के लिए कौन सा उपाय किया जाए? इस साधन के लिए केवल दो ही मार्ग सहायक हैं: या तो निरंतर श्री हरि का भजन किया जाए, या फिर सत्संग का आश्रय लिया जाए।

  7. रसिक रँगे जे जुगल रँग - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (28)

    जो रसिक भक्त श्री युगल किशोर श्यामा-श्याम के प्रेम-रंग में रँगे हुए हैं, उन्हीं का उच्छिष्ट-प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। मनमुखी रीति से जहाँ-तहाँ खाने-पीने से भजन का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

  8. खान पान तौ कीजिये - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (27)

    रसोपासना के भजनी को रसिक-मण्डली में ही खान-पान करना चाहिए। जो लोग अन्य उपासना में लगे हुए हैं, उनके साथ खान-पान करना उचित नहीं माना गया है।

  9. बहुत मिले तो संग नहीं - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, मन शिक्षा लीला (37)

    संसार में अपनी उपासना से भिन्न प्रकार के उपासक अधिक मिलते हैं, किन्तु उनका संग करना उचित नहीं है। वास्तव में अपनी जाति के वे ही सच्चे उपासक हैं, जो युगल श्री श्यामा-श्याम के प्रेम-रस में निमग्न अनन्य रसिक हैं।

  10. भक्तनि निंदा अति बुरी - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (21)

    भक्तों की निंदा सबसे बुरी है, और भूलकर भी उसे नहीं करनी चाहिए। उसके द्वारा अनेक जन्मों में किए हुए पुण्य एक क्षण में नष्ट हो जाते हैं।

  11. बाँह जोरी चलत दो - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (59)

    विशाल नयन वाले रसिक युगल ललित लाड़िली–लाल परस्पर गलबहियाँ डाले हुए वृन्दावन की कुंज-वीथियों में विचरण कर रहे हैं—ऐसा ध्यान करना चाहिए।

  12. अद्भुत युगल विहार कौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (64)

    जो रसिक श्री श्यामा–श्याम के अद्भुत युगल-विहार के चिंतन-मनन में मग्न रहते हैं, उनकी चरण-रेणु को बार-बार अपने मस्तक पर धारण करते रहना चाहिए।

  13. जिनके देखै पुलक तन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (33)

    जिन रसिक भक्तों के दर्शनमात्र से तन-मन-प्राण प्रफुल्लित हो जाएँ, और जिनकी मधुर वचनावली का श्रवण करते ही नेत्र अश्रुपूरित हो जाएँ—ऐसे रसिकों का ही संग करना चाहिए।

  14. तिय सुत नाती नातिनी तिनहीं तन चित दीय - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (62)

    पत्नी, पुत्र, पुत्री, नाती-नातिनों आदि में ही जिनका चित्त आसक्त रहता है, उनके हृदय में श्री राधावल्लभ लाल जी तनिक भी नहीं आ पाते।

  15. संग सोई जाके मिले भूलै गृह व्यौहार - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (32)

    श्रीध्रुवदासजी का कथन है कि रसोपासना के मार्ग में साधक को केवल उन्हीं का संग करना चाहिए, जिनके सान्निध्य में आते ही समस्त सांसारिक व्यवहार विस्मृत हो जाएँ। वह संग ऐसा दिव्य होना चाहिए जिससे उपासक के अंतःकरण में श्रीप्रिया-प्रियतम के अद्भुत युगल-विहार की सतत स्फूर्ति होने लगे; वास्तव में वही वास्तविक सत्संग है।

  16. नवल किशोरी कुँवरि की सहजहि ऐसी बानि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (56)

    श्रीराधारानी का यह सहज स्वभाव एवं विरद है कि जो भी एक बार उनकी शरण में अनन्य भाव से आ जाता है, वे उसका साथ कभी नहीं छोड़तीं।

  17. अवगुण करे समुद्र सम गिनत न अपनों जान - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (60)

    समुद्र के समान अवगुण होते हुए भी किशोरीजी उन अवगुणों को देखती नहीं और राई के समान भजन करते हुए भी, अर्थात् बहुत ही थोड़ा, उस भजन को भी किशोरी जी सुमेरु पर्वत के समान मानती हैं।

  18. जुगल प्रेम रस मगन जे - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (30, 31)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं— युगल किशोर श्री श्यामाश्याम के प्रेम-रस में जो मग्न है, उसी को अपना मानो। हृदय में हर प्रकार से, बिना किसी भेद अथवा छिपाव के, उसी से अपना प्रेम मानो।