पदावली [घनानंद ग्रंथावली]
पदावली, घनानंद ग्रंथावली ग्रंथ का एक अध्याय है, जिसमें रस पदों को काव्यात्मक शैली में क्रम से पिरोया गया है, जिसे श्री आनंदघन जी ने लिखा है।
20 लेख उपलब्ध हैं
या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)
श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं— इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है।
नित बिहार बृंदावन राधा मोहन - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637)
श्रीराधा और श्रीमोहन (श्रीकृष्ण) श्री धाम वृन्दावन में नित्य विहार करते रहते हैं। वे स्वभाव से ही सहज रंगीले, छैल-छबीले हैं, जो हृदय में प्रेम का संचार (आदान-प्रदान) करते रहते हैं ।
राधे दै बृंदावन-बास - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)
हे श्रीराधे! कृपा करके मुझे श्रीवृंदावन में निवास प्रदान कीजिए। मेरा मन उसी प्रकार आप में स्थिर बना रहे, जैसे कोई पनिहारिन अपने सिर पर मटका रखे चलती है— सखियों से हँस-बोल भी रही होती है, पर उसका ध्यान सदा मटकी पर ही टिका रहता है। ऐसी कृपा हो कि मेरा यह तन भी आपकी सेवा में निरंतर लगा रहे।
ऐसें आरती करौ - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (240)
प्रभु की आरती करनी हो तो ऐसी करो, हृदय-रूपी स्थिर और विशाल थाल सजाकर, उसमें प्रेम-रूपी दीपक को प्रज्ज्वलित कर रख दो।
देख्यौ देख्यौ राधा को बृंदावन - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (690)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "मैंने श्री राधा रानी का वृन्दावन देख लिया है, जिससे मेरा जीवन सब प्रकार से सफल हो गया है।
मोहि दीजै जू ब्रजवास - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (755)
श्री आनंदघन कह रहे है "हे नन्द महाराज तथा वृषभानु राय जी, कृपया मुझे ब्रजवास प्रदान कीजिये, मेरे ह्रदय की इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिये।
छबीलो रसिकराय नवरंग - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (698)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "नित्य नवरंग रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुंदर छबीले हैं। सुन्दर हाथों में सुन्दर मुरली धारण किये हुए श्री मनमोहन के समस्त अंग अति सुन्दर हैं।
बृंदावन नीको लागै है - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (721)
श्री आनंदघन कह रहे है "श्री धाम वृन्दावन, जो सजल है, सघन है, श्री श्यामसुंदर के प्रेम का बाग है, मुझे अति प्रिय है। श्री यमुना के किनारे श्री श्यामसुंदर का विचरण देख ह्रदय बिंध जाता है।" श्री आनंदघन कह रहे है "श्री श्यामसुंदर की मुरली की मधुर धुन सुनकर कोकिला अलाप ले रही है।"
राधा माधौ बिहरै बन मैं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (188)
श्री आनंदघन कह रहे हैं, श्री वृन्दावन में यमुना तट पर हरी भरी कुंजों में श्री राधा माधव मन में फुले फुले विचरण करते हैं।
रँगीली जोरी की बलि जाँव - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (795)
श्री आनंदघन कह रहे है "ललित रूप - गुण की राशि, रँगीली जोरी श्री श्यामा कुंजबिहारी की बलिहारी है, जो सदैव यमुना किनारे कदम्ब लताओं के वन में विहार परायण हैं ”।
जो तुम बनावौगे सोई बनिहै - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (720)
श्री आनंदघन कह रहे है "हे ब्रज के नायक श्री कृष्ण, मेरा जो भी भाग्य आप बनाओगे वही होगा, मेरे सोचने से कहाँ कुछ होगा। अब तक आपने मेरी बहुत अच्छी बनायी है, आगे भी मंगल ही होगा।
सब-सुख-सोभा-मूल बृंदावन धन मेरे - श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (759)
श्री आनंदघन कह रहे है "समस्त सुख तथा शोभा का मूल श्री वृन्दावन धाम ही मेरा जीवन धन है, जहाँ नित्य श्री राधा मोहन का नाम गाऊंगा और प्रातः संध्या श्री यमुना जी में स्नान करूँगा।
रसिकनी राधा राधा है - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (792)
श्री आनंदघन कह रहे है "रस प्रदान करनेवाली रस की मूर्तिमान स्वरुप, मूल रूप से रस स्वरुप, रसिकनी केवल श्री राधा हैं, जिनसे मिलने के लिए श्री श्यामसुंदर नित्य ही प्रयास रत रहते हैं। [1]
राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (500)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "राधा राधा रटते रटते मेरी रसना रसीली बन गयी है, एवं जितना अधिक इस अद्भुत रस का पान करता हूँ, उतनी ही अधिक नवीन प्यास प्रकट हो रही है ।
अब कछु बाधा नाहिं रही - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, , पदावली (86)
अब कोई बाधा नहीं रह गयी है, क्यूँकि अब मुझे मदन गोपाल मिल गए हैं, सारे साधन सफल हो गए हैं।
ए री रूप-अगाधे राधे, राधे राधे राधे राधे - श्री आनन्दघन जी
हे श्री राधे, ब्रजमोहन श्री श्यामसुंदर आपसे मिलने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं, और केवल राधे राधे की पुकार कर रहें हैं।
सुहागिनि राधा रानी - श्री आनन्दघन जी, पदावली (65)
श्री श्याम सुंदर, ब्रजराज-दुलारे जिनके नित्य ही वश में रहकर स्वयं को अभिमानी मानते हैं वही परम सुहागिनी श्री राधा रानी हैं।
तिहारो सुख जौ मन मैं आवै - श्री आनन्दघन जी
वृंदावन के सुख का वर्णन करते हए श्री आनंदघन जी कहते हैं कि जैसे ही वृंदावन के सुख (रस) हृदय में आता है तो अपने भाग्य की महिमा का वर्णन करना असम्भव सा लगता है ।
मोकौं सदा सरन यह वन है - श्री आनन्दघन जी
मेरी एक मात्र शरण सदा से वृन्दावन धाम ही है। श्री राधा रानी ही मेरा जीवन प्राण एवं जीवन धन है एवं एक अपूर्व ज्योति की भाँती मेरी आंखों के आगे सदैव जगमगाती रहती है।
जो कोऊ वृन्दावन बसि जानै - श्री आनँदघन जी, पदावली (692)
जो कोई भी समस्त इच्छाओं को त्याग कर वृंदावन में वास करता है, और दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण की उपासना करता है, वह परमार्थ की पूर्णता को प्राप्त करता है और सदैव संतुष्ट रहता है।