श्री प्रबोधानंद सरस्वती

श्री प्रबोधानंद सरस्वती श्री वृंदावन महिमामृत के लेखक, श्री चैतन्य महाप्रभु के अंतरंग शिष्य एवं रासिकाचार्य थे।

127 लेख उपलब्ध हैं

  1. राधा पदाब्जसेवान्यस्पृहा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

    भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में श्रीराधा-दासी को श्रीराधा के चरण-कमलों की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। वह श्रीराधा के विशुद्ध प्रेम से प्रकट होने वाले असीम रस-सागर में सदा निमग्न रहती है।

  2. यत्रैवातिरसोन्मदं विहरते मत्प्रेष्ठवस्तुद्वयं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.99)

    जहाँ अत्यन्त प्रेमरस में मग्न होकर मेरे प्रियतम युगल (राधा-कृष्ण) नित्य विहार करते हैं, जहाँ भक्ति महारसमय उत्सव की तरह निरन्तर प्रवाहित हो रही है, जहाँ वेद उपनिषत् की गूढ़ वाणियाँ प्रवेश नहीं प्राप्त कर सकतीं, उसी पावन श्रीवृन्दावन में मेरी बुद्धि प्रेमपूर्वक सदा लगी रहे।

  3. यदैव सच्चिद्रसरूप - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.84)

    जब श्री वृन्दावन में स्थित स्थावर और जंगम सभी में सत्-चित्-रसस्वरूप बुद्धि निष्कपट रूप से उत्पन्न होती है, तब ही मनुष्य को श्री राधा की प्रिय सेवा-योग्य दासी-रूप की प्राप्ति होती है।

  4. मा कुरुकर्म न योगं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (7.09)

    मत करो कोई कर्म, मत करो योग, मत करो विष्णु का भजन, मत करो उनके गुणों का श्रवण। तुम्हें केवल इतना ही करना है कि जैसे बन पड़े, वैसे ही वृन्दावन में पड़े रहो। केवल वृन्दावन में पड़े रहने मात्र से ही तुम निश्चित रूप से परम पद को प्राप्त कर लोगे।

  5. सकल विभव सारं सर्व धर्मैक - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.85)

    सब वैभवों का सार, समस्त धर्मों का सार, समस्त भजन का सार, समस्त सिद्धियों का सार, समस्त महिमाओं का सार तथा समस्त माधुर्य एवं रसों का सार, श्री धाम वृन्दावन का नित्य विहार है।

  6. न राधा न राधाप्रियो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.60)

    जिसके हृदय में नित्य श्रीराधा, श्री कृष्ण, श्रीवृन्दावन तथा उनके प्रेमी रसिक-भक्त (सहचरी) गोचर नहीं होते हैं और न ही वाणी द्वारा कोई प्रचार होता है, वे इस अति अद्भुत रसश्री (वृन्दावन रस) का आस्वादन कैसे कर सकते हैं?

  7. राधानन्तापराधात्‌ पततां - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.100)

    जो व्यक्ति श्रीराधा महारानी के प्रति अपराध करता है, वह उस अनंत अपराधों के कारण संसार की बाधाओं रूपी समुद्र में गिरकर उद्धार से वंचित रह जाता है। स्वयं श्रीवृन्दावन भी उस अपराधी पर करुणा नहीं करता, और अपनी कृपादृष्टि से उसे वंचित रखता है।

  8. जयति जयति राधा प्रेमसारैरगाधा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.45)

    अगाध प्रेमसार-रूपिणी श्रीराधा की जय हो, जय हो ; उन राधा-रस के लिए अपार तृषातुर श्रीकृष्ण की जय हो, जय हो ; इन युगल के मिलाप की आकांक्षा करने वाली सखीवृन्दों की जय हो, जय हो; एवं उनके निज-धाम श्रीवृन्दावनकी जय हो, जय हो।

  9. श्रीवृन्दावनवत्तिरनि यत्र - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.12)

    श्रीवृन्दावन का जहां भी कोई अपराध करता है, वह साक्षात श्रीराधाकृष्ण का ही द्रोही है। उसका बहुत काल तक पीछे भी नरक से उद्धार नही होता।

  10. वेदान्ताः प्रतिपादयन्ति मुखतो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.6)

    श्री वृन्दावन की महिमा वेदान्त-समूह मुख से (मुख्यावृत्ति से) प्रतिपादन न करें तो मेरा क्या? शास्त्र रूप गत्र्त में गिरे हुए कुतार्किक गण यदि श्री वृन्दावन का सम्मान न करें, तो इससे मेरी हानि क्या? एवं इस श्री धाम का माहात्म्य भगवद्-भक्तों के अनुभव-गोचर न हो, तो भी मेरा क्या? किन्तु मेरा शरीर सहस्र व्रजों के द्वारा छेदित-भेदित सा होकर भी श्री वृन्दावन से अन्यत्र किञ्चित् मात्र चालित न हो।

  11. दिने दिने तिवर्द्धिष्णु - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.66)

    प्रतिदिन अत्यन्त वर्द्धनशील महाभक्ति व वैराग्ययुक्त होकर, कोई एक भाग्यवान पुरुष ही अनन्य रूप से श्रीराधा-पदाश्रित होकर श्रीवृन्दावन में वास करता है ।

  12. जहि विषय दुर्विषवनं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.3)

    हे मति रूप पक्षिनि! विषय के जहरीले वन को त्याग कर दुराशाओं के पाशों को काट डाल, अमृत स्वरूप श्रीवृन्दावन में ही उड़ चलना तुम्हें उचित है।

  13. माऽस्तु मम कदापि पापरूपिणो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.80)

    मुझ घोर पापी का भले कभी भी नरक से भी उद्धार न हो, किन्तु श्रीवृन्दावन-नाम, श्रीराधा नाम तथा श्रीराधानागर [कृष्ण] के नाम को कभी न भूलूं।

  14. दुश्चेष्टानां दुर्मतीनांच कोटि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.48)

    इस श्रीवृन्दावन में मुझसे कोटि-कोटि दुश्चेष्टाएं हो या कुमति उदय हों या घोर अनर्थ तथा दुर्वासनाएं उदित हो, एकमात्र श्रीराधा-नाम मुझे कदापि विस्मृत न हो ।

  15. हरिभक्ति सुरस सिन्धो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.35)

    हरि भक्ति के सुरस सिन्धु मंथन से यह अनिर्वचनीय सार रूप श्रीवृन्दावन प्रकट हुआ है, समस्त असार वस्तुओं को त्याग कर परम उदार श्रीराधिका- उपवन (इस श्रीवृन्दावन) का आश्रय कर ।

  16. पततु मदुपरिष्ठात् कोटिशो वज्रपातः - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.39)

    मेरे ऊपर कोटि-कोटि वज्रपात हों और समस्त भुवनों को जला देने वाली अग्नि ही उत्थित हो जाय, अथवा प्रलयकालीन कोटि-कोटि प्रचण्ड सूर्य ही उदिन हो उठे, तथापि श्रीवृन्दावन को त्याग करने के लिए मैं कभी तैयार नहीं हूँगा ।

  17. अरे शीघ्रं शीघ्रं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.21)

    अरे! स्त्री, पुत्र, धनादि में ममता बढ़ाने का यह समय नहीं है, यह शरीर मृत्यु की ओर बढ़ रहा है । समस्त दुर्लभ वस्तुओं में भी अति सुदुर्लभ यह श्रीवृन्दावन अपनी कृपा से इस पृथ्वी पर प्रगट हुआ है, इसलिये शीघ्रातिशीघ्र श्रीवृन्दावन की ओर दौड़कर चल ।

  18. त्वयि रचयति राधिकाऽवनाशा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.41)

    “तुम्हारी रक्षा करूंगी” - इस प्रकार श्रीराधा के आश्वासन देते ही माया भयभीत होकर भाग गई है। हे दृष्ट हृदय! आकाश फूलों के समान काल्पनिक (झूठे) तुम्हारे सैकड़ों विकार अब कहाँ रहे हैं ?

  19. श्रीमद्वृन्दावनेश्वर्य्या: सकृन्नामैक मंगलम् - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.126)

    श्रीमद्वृन्दावनेश्वरी (श्रीराधा) का एक बार ही श्रीराधा-नाम लेने से समस्त मंगल प्राप्त होते हैं, एवं समस्त अनन्त शक्तियों का विकास होता है। वह श्रीराधा-नाम सदा मेरी जिह्वा पर जय युक्त होकर विराजमान् रहे ।

  20. वृन्दारण्योत्तमं नास्ति-नास्ति - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.125)

    श्रीवृन्दावन से अधिक श्रेष्ठ (अधम-उद्धारक) धाम और कोई नहीं है, एवं मेरे समान अधम और कोई नहीं है। "श्रीराधा" नाम के बल से ही इन दोनों का मिलन हो सकता है (अर्थात् “श्रीराधा” नाम के बिना श्रीवृन्दावन का संयोग वा वास कदापि नहीं हो सकता) ।