पूर्वार्ध [व्यास वाणी]

पूर्वार्ध, श्री व्यास वाणी का प्रथम भाग है । रचयिता: श्री हरिराम व्यास

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  1. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  2. कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)

    मैं इस पावन श्री वृन्दावन धाम को त्याग कर कहाँ जाऊँ? मुझ जैसे अधम और तुच्छ प्राणी के लिए श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान नहीं है।

  3. अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)

    अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते।

  4. श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (288)

    हे श्रीराधावल्लभ! आप ही मेरे सच्चे हितैषी हैं। संसार के समस्त रिश्ते केवल तब तक ही साथ देते हैं जब तक उनका स्वयं का कोई स्वार्थ जुड़ा हो।

  5. मन रति वृंदावन सौ कीजै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (24)

    हे मन, श्री वृन्दावन से प्रेम कर — तू अब तक केवल इंद्रिय-सुखों में पशुवत जीवन जीता रहा है, अब जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त कर।

  6. (श्री) राधावल्लभकौ हौ भांवतौ चेरौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (133)

    मैं श्री राधावल्लभ जी का चहेता दास हूँ। श्री राधावल्लभ का नाम श्रवण एवं उच्चारण करने मात्र से मेरे मन में यम, नियम, आदि नहीं ठहरता।

  7. सुभग गोरी के गोरे पाँइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (80)

    गौरवर्ण वाली श्री राधिका के गोरे चरणारविंद की शोभा अत्यंत सुंदर है, जिन्हें स्वयं श्यामसुंदर प्रेम-विवशता से अपने करकमलों में धारण करते हैं और अपने कंठ से लगाते हैं।

  8. लागी रट, राधा श्रीराधा नाम - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (39)

    अब मैंने श्री राधा नाम की रटना लगा दी है। मैंने समस्त वृन्दावन में ढूंढने का प्रयत्न किया परंतु नंद के नटखट दुलारे श्री श्यामसुन्दर कहीं नहीं मिले।

  9. अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (70)

    श्री स्वामी हरिदास जी अनन्य रसिक प्रेमियों में सर्वोच्च सम्राट के समान हैं। वृंदावन के एकांत कुंजों में श्री कुंज बिहारी-बिहारीणी के अतिरिक्त उन्होंने न तो कहीं और दृष्टि डाली और न ही किसी अन्य से आशा की, चाहे वो कोई भी हो।

  10. अनन्यनि कौनकी परवाहि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)

    श्री राधा कृष्ण के अनन्य रसिकों को किसी की परवाह नहीं होती । वे तो कंधे पर कंबल एवं हाथ में करुवा लिए, नित्य श्री कुञ्जबिहारी की ही अनन्य आशा बनाये रखते हैं ।

  11. जाकी है उपासना, ताहीकी वासना - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (179)

    साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों का गान करना चाहिए।

  12. मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (132)

    अरे मन बाँवरे, तू अब जाके श्री हरि के चरणों में अटका है, इसी वजह से अब तू साँचा सुख प्राप्त कर रहा है । जब तू संसार में था तो इसी आनंद के लिए घर घर भटकता था और हर जगह केवल दुख ही दुख मिलता था ।

  13. आसू कौ हरिदास रसिक हरिवंश - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (80)

    अनन्य रसिक संत श्री स्वामी हरिदास जी एवं श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी की कृपा की अभिलाषा है एवं उनके द्वारा दिखाये गए पथ पर ही चलना है क्योंकि मेरे ह्रदय को उनके द्वारा प्रवर्तित श्यामा श्याम की रस उपासना पद्धति भाती है ।

  14. नव कुँवर चक्र चूड़ा नृपतिमनि साँवरौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (46)

    श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्‍याम सुन्‍दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं । पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों का स्वामी यह वृंदावन धाम है ।

  15. कहा भयौ वृंदावनहि बसै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262)

    श्री धाम वृंदावन में यदि वास भी मिल गया तो ऐसा क्या हो गया क्योंकि जब तक लोभ एवं पाखंड रूपी माया से वे ग्रसित है तब तक उसने घर को त्याग कर भी ऐसा क्या कमाल कर दिखाया?