श्री राधा सुधा निधि

श्री राधारानी की दासी भाव से, मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने इस विशेष रस के ग्रन्थ को प्रकट किया है। लेखक: श्री हित हरिवंश महाप्रभु

118 लेख उपलब्ध हैं

  1. यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (72)

    जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय की प्रबल गति से साधारण गोपी सी प्रतीत हो गई हैं — हे दैव (काल)! तुम्हें नमस्कार है।

  2. यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योति - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (136)

    जिनकी प्रकाशमान् पद-नख-मणि-ज्योति की एक छटा का विलास सघन प्रेमामृत-रस के कोटि-कोटि सिन्धुओं के समान है। वे श्रीराधा यदि कदाचित् मुझ पर कृपा-दृष्टि-पात कर दें तो अनेक प्राकृत-अप्राकृत शोभायें और मुक्ति भी मेरे लिये तुच्छ हो जायँ ।

  3. लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (239)

    लक्ष्मी को भी जिसका साक्षात्कार नहीं होता, जिसे श्रीदामा आदि सखागण भी प्राप्त नहीं कर सके, जो ब्रह्मा, नारद, शिव, सनकादि के द्वारा कल्पनीय नहीं है, जो श्रीवृन्दावन की नागरी गोपिकाओं (ललितादिकों) के भाव (सखी भाव) द्वारा (ही) प्राप्त है, श्रीराधामाधव के उस एकान्त दास्य का अधिकार मुझे कैसे मिले ?

  4. कदा वा राधायाः पदकमल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (191)

    मैं कब श्रीराधा के परम करुणायुक्त चरण कमलों को हृदय में धारण करके इस संसार के नियमित विधि निषेधों को पूर्ण रूप से त्याग दूंगी, और कब सर्व सुखद गोविन्द मुझे श्री राधा के प्रति अनन्यता से धन्य दासी जान, निकुंजांतर सेवा योग्य काम-कला का शिक्षण करेंगे?

  5. यस्यास्ते बत किंकरीषु - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (93)

    वृन्दाटवी कन्दर्प श्रीलालजी श्री राधिका के प्रसादोत्सव की इच्छा से उनकी किंकरियों की अत्यन्त हर्ष-पूर्वक अधिकाधिक सदा चाटुकारिता करते रहते हैं । आपके जिन युगल चरण-कमलों से सदा ही घनीभूत आनन्द एवं अनुराग की लहरें प्रवाहित होती रहती है, हे वृषभानुनन्दिनि ! मैं आपके उन्हीं श्रीचरणों की सदा बन्दना करती हूँ ।

  6. यल्लक्ष्मी शुक नारदादि - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (85)

    हे नव- कुञ्ज नागरि ! मैं आपके उस कैंकर्य प्राप्ति की आशा को धारण किये हुए हूँ जिससे क्षण-क्षण में अद्भुत रस की प्राप्ति होती है और जिसे उन अनुराग-उत्सव मयी ब्रज-किशोरी गणों ने प्राप्त किया था, जिन ब्रजांगनों के अनुराग-उत्सव की लालसा लक्ष्मी, शुक, नारद आदि को भी रहती है। हे श्रीराधे ! मेरे लिये आप अपनी उस कृपा-दृष्टि का दान क्या कभी करोगी?

  7. प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (78)

    जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-कर्ती हैं। जो ईश्वर-रूप श्रीकृष्ण की शची हैं तथा समस्त ऐश्वर्य शक्तियाँ पार्वती, इन्द्राणी और महासुख स्वरूपा की स्वतन्त्र सुखमय वपुधारिणी शक्ति हैं; वे श्रीवृन्दावन के नाथ की पटरानी 'श्रीराधा' ही केवल मेरी सेव्या एवं आराध्या हैं ।

  8. लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (81)

    श्री गुरु द्वारा दिए गए भजन के पराक्रम से युक्त वे कोई महाबुद्धिमान विरले ही अनन्य रसिक जन हैं, जो न तो भुजाओं में शंख चक्र आदि वैष्णव चिन्हों को धारण करते हैं, और न ही कभी ललाट पर वैष्णव तिलक आदि रचते हैं, और न ही अपने कंठ में सुहावनी तुलसी माला को धारण करते हैं । उन्हें तो इन सब बाहरी लक्षणों की सुधि ही नहीं, वे किसी अंतरंग राधा रस में डूबे हुए हैं ।

  9. यज्जापः सकृदेव गोकुलपतेराकर्षकस्तत्क्षणाद्यत्र - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (94)

    जिसका एक बार मात्र उच्चारण गोकुल- पति श्रीकृष्ण को तत्क्षण आकर्षित करने वाला है, जिससे प्रेमियों के लिये अर्थ, धर्मादि समस्त पुरुषार्थों में तुच्छता का स्फुरण होने लगता है, एवं जिस नाम से अङ्कित मन्त्रराज (द्वादशाक्षर मन्त्र) के जपने में माधव श्रीकृष्ण भी सदा-सर्वदा प्रीतिपूर्वक संलग्न रहते हैं । वही अत्यद्भुत दो वर्ण 'राधा' मेरे हृदय में स्फुरित हों ।

  10. सदा गायं-गायं मधुरतर राधा-प्रिय यशः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (253)

    मैं श्रीराधा के नव-निभृत केलि कुञ्ज कानन में स्थित रहती हुई, सदा मधुरतर श्रीराधा के प्रिय यशों का तथा घनीभूत नव-नव आनन्द-रस-दायी श्रीराधापति की कथाओं का बारम्बार गान करती हुई एवं श्रीराधा-पद-सुधा का सर्वदा ध्यान करती हुई कब विवश हृदय होऊंगी ?

  11. प्रत्यङ्गोच्छलदुज्ज्वलामृत - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (135)

    प्रेम का एक अनुपम परिपूर्णतम सागर है। जिसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों से नित्य-प्रति उज्ज्वल अमृत-रस उच्छलित होता रहता है । वह (प्रेममहानिधि ) लावण्य का भी अनुपम समुद्र है और अत्यधिक कृपामय वात्सल्य-सार का भी अम्बुधि है । वह तारुण्य के प्रथम-प्रवेश से विलसित माधुर्य-साम्राज्य की भूमि है, और रस की एकमात्र सीमा है । वही ‘राधा’ नामक कोई परम-गुप्त महानिधि सर्वोत्कर्ष-पूर्वक विराजमान है।

  12. कामं तूलिकया करेण हरिणा यालक्तकैरकिंता - श्री राधा सुधा निधि (205)

    श्री कृष्ण ने अपने हाथ से भली भांति जिन्हें महावर से अंकित किया, जो नाना केलियों में चतुर गोपांगनाओं के यूथ में वंदित हैं तथा जो वेद शिरोरूप उपनिषदों के ह्रदय में गुप्त रूप से ही प्रकाशित हैं वह एकमात्र लास्य (नृत्य) से पूर्ण श्री राधा के युगल चरण मेरी गति हैं।

  13. कालिन्दी – तट कुञ्ज-मंदिरगतो - श्री राधा सुधा निधि (95)

    योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण-ज्योति के ध्यान-परायण होकर प्रेमाश्रु-पूर्ण नेत्र तथा गद्-गद् वाणी से कालिन्दी-तट के किसी निकुञ्ज मन्दिर में विराजमान् श्रीहरि भी स्वयं जिस नाम का जप करते हैं। वही अनिवंचनीय अद्भुत उल्लासमय एवं रति-रसानन्द से सम्मोहित 'राधा' इन दो अक्षरों की पराविद्या मेरे हृदय में सदा स्फुरित रहे ।

  14. राधादास्यमपास्य यः प्रयतते - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (79)

    ‘श्रीराधा’ के कैंकर्य को छोड़कर जो गोविन्द के संग की चेष्टा करते हैं, वे बिना पूर्णिमा तिथि के पूर्णचन्द्र प्राप्त करना चाहते हैं। कृष्णप्रेम प्रवाह की लहरों का बीज 'श्रीराधा' को न जानने से महान अमृत के सागर को पाकर भी एक बूँद ही पा सकेंगे।

  15. लावण्यामृतवार्त्तया जगदिदं संप्लावयंती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (61)

    (अपने) रोचक एवं रसपूर्ण वार्तालाप से इस जगत को आप्लावित (सराबोर) करती हुई (एवं) मुखचन्द्र की चाँदनी से शरद ऋतु के अनन्त पूर्ण चन्द्रों का विस्तार करती हुई (विकसित करती हुई) तथा अपना दास्य रूप उत्साह प्रदान करके समस्त साध्य-साधन की चर्चा को, अहो, तुच्छ बनाती हुई, श्रीवृन्दावन कुंज-सदन की कोई अनिर्वचनीय स्वामिनी (श्री राधा) विराजमान हैं ।

  16. श्रीराधिकां निजविटेन सहालपन्तीम् - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (28)

    श्रीप्रियाजी अपने प्रियतम श्रीलालजी के साथ कुछ मधुर मधुर बातें कर रही हैं, जिससे उनके लाल-लाल ओठों से सौन्दर्य्य-राशि निकल निकलकर चारों ओर फैल रही है। अहा ! जिनके विशाल भाल पर सिन्दूर-रञ्जित मोतियों की पंक्ति शोभायमान् है और दन्त पंक्ति कुन्द-कलियों को भी लज्जित कर रही है । वही धन्य हैं जो ऐसी श्रीप्रियाजी के भावना परायण हैं।

  17. श्रीराधिके सुरतरङ्गि नितम्ब भागे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (19)

    हे श्रीराधिके ! हे सुरत-केलि-रंजीत नितम्ब-भागे ! अहा ! आपका यह काञ्ची-कलाप क्या है मानो कल हंसों का कल-कल अनुलाप है, और चरण-कमलों के नूपुरों की मन्द-मन्द झनकार ही मानों मतवाले भ्रमरों का गुञ्जन है। स्वामिनि ! आप अपने इसी मधुर रस की छटा से मुझे शीतल कर दीजिए।

  18. श्रीगोपेन्द्र-कुमार-मोहन - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (188)

    जो नन्दनन्दन को मोहित करने वाली महा विद्या रूपा हैं, जिनके नेत्रों की कोरों से उमड़ती हुई महा माधुरी के सार का उछलता हुआ रस-समुद्र सहज रूप से प्रवाहित होता रहता है, जिनकी कटाक्ष-भंगिमायें करुणा से भींगी हुई हैं, जिनका मुख कमल मधुर-मधुर मुस्कुराता रहता है (ऐसी) हे स्वामिनी राधिके ! मुझ पर थोड़ी-सी कृपा दृष्टि कीजिए।

  19. कृष्णामृतं चल विगाढुमितीरिताहं - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (14)

    जब श्री राधा मुझसे कहेंगी- "अरी सखि ! श्रीकृष्णामृत अवगाहन करने के लिए चल" । तब मैं हँसकर कहूँगी- "हे सखि ! तब तक धैर्य्य रखो जब तक रात्रि नहीं आ जाती।"

  20. राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (117)

    श्रीराधा के चरणकमलों में अचल और निष्कपट भक्ति देखकर मोहन (श्रीश्यामसुन्दर) अतिशय महाप्रेम से सर्वात्मना अपना भजन करने वालों से भी अधिक प्रसन्न होकर, उसे (श्रीराधा भक्त को) आलिंगन करते हैं, चुम्बन करते हैं, अपने मुखसे उसके मुख में ताम्बूल (पान का बीड़ा) देते हैं तथा उसके कण्ठ में अपनी वनमाला पहिना देते हैं। ऐसा वे (श्रीमोहन) मेरे प्रति भी कब करेंगे ?