रस के पद [श्री ललित मोहिनी देव जी की वाणी]
रस के पद, ग्रंथ श्री मोहिनी देव जी की वाणी में श्री मोहिनी देव जू द्वारा लिखित रस के पदों का संकलन है।
रचैयता: श्री मोहिनी देव जू
20 लेख उपलब्ध हैं
आज समाज सहज मन भायौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)
आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है।
उमॅगि-उमॅगि आये चहुँदिसि बदरा - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (55)
चारों दिशाओं से उमड़-उमड़कर कामदेव के अनुराग से सराबोर श्याम घटाएं घिर आई हैं। उन मेघों में सौंदर्य रूपी अमृत से भरी हुई बिजली चमक रही है, जिससे संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है।
आजु बधाई वृंदावन सुख-सिंधु हिलोर - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (62)
आज इस दिव्य वृन्दावन में बधाई है, जहाँ सुख का सागर निरंतर तरंगायित हो रहा है। प्रिया-लाल अपने तन और मन से उल्लासित हो रहे हैं, और कामदेव-रूपी मेघ गंभीर स्वर में गर्जना कर रहे हैं।
पिय पियरी सेज बनाई आज - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (47)
प्रियतम ने आज पीली सेज सजाई है। चारों ओर की चमक-दमक भी पीली ही पीली है। अपने अंगों को भी इन्होने पीले वस्त्रों से सजाया है।
रोम-रोमनि अरुझि विलसत कामिनी - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (49)
दिव्य प्रेम रूपी कामनाओं से भरे दोनों (प्रिय-प्रियतम) इस प्रकार रस-विलास कर रहे हैं कि एक की रोमराजि दूसरे की रोमावली में उलझी हुई है। अँग-अँग में समाया हुआ है, मन मन में बस गया है। सुखमय यामिनी (रात्रि) में रस की बाढ़ आ रही है।
आवनौ जावनौ कहूं नाहीं - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (64)
हम श्रीवृन्दावन को त्यागकर अन्यत्र कहीं जाते-आते नहीं क्योंकि यहीं श्रीहरि हमारे मन के समस्त भावों का पोषण करते रहते हैं और हम श्रीहरि के भावों का (पोषण करते रहते हैं)।
रंग हिडोरना री झूलत लाडिली पिय के संग - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (66)
प्यारीजी (श्री राधा) प्रियतम (श्री कृष्ण) के साथ रंग (रस-विलास) के हिंडोले पर झूल रही हैं। सुन्दर रंग के वस्त्र धारण किये हुए वे मंद-मंथर गति से झूमती हुई प्रफुल्लित हो रही हैं।
हौं हूँ आई देखन स्याम - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (46)
मैं उन श्यामसुन्दर को देखने आई हूँ, जो साँवले सलौने हैं, जिनके नेत्र विशाल हैं और जिन्हें श्री किशोरीजी ने सब प्रकार से पूर्णकाम कर रखा है।
प्रियालाल खेलत बसंतर - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (51)
प्रियाप्रियतम फाग खेल रहे हैं। झाँझ, मृदंग, डफ, वंशी, वीणा और मुहचंग सुन्दर सुरीली तान में बज रहे हैं ।
मत्त भये तन-मन न सँभार - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (60)
दिव्य युगल (श्री राधा कृष्ण) नित्यविहार में ऐसे उन्मत्त हो रहे हैं कि उन्हें तन-मन की कोई सुध-बुध ही नहीं रहा है । दोनों ओर अपार आनंद उमड़ रहा है और दोनों एक दूसरे के कंठहार बने हुए हैं ।
जैसे मेरे जिय में तू बसत है - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (59)
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जैसे मेरे ह्रदय में आप बसी हैं, वैसे ही मैं आपके ह्रदय में बसा हूँ कि नहीं ? आपकी छवि तो अहर्निश मेरे नेत्रों में समाई हुई है । मेरा तो जीवन केवल आप हो, आपके अतिरिक्त अन्य मुझे कुछ भी भाता नहीं ।
यह आनंद कह्यौ ना परै री - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (48)
श्रीललितमोहिनीजी कहती हैं कि हे सखी ! इस नित्य विहार रस का वर्णन नहीं किया जा सकता । रंगमहल की सेज पर ये दोनों प्रिया-प्रियतम अद्भुत खेल, खेल रहे हैं । रस का सेवन करते हुए इन दोनों ने कामदेव को परास्त कर दिया है ।
रूप के जाल परयौ मन मेरौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (54)
श्री ललित मोहिनी जी कहती है कि मेरा मन श्री श्यामा कुंज बिहारी के सौंदर्य जाल में ऐसा फंस गया है कि निरंतर उन दोनों की मुस्कानों में उलझा रहता है जो यौवन रस (नित्य बिहार का सुख) का सतत पान करते हुए भी सदा अतृप्त बना रहता है ।
प्रानप्रिया सखि आजु बनी - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (54)
एक सखी दूसरी से कहती है - हे सखी ! आज मेरी प्राणप्यारी श्री किशोरी जी बहुत ही सुन्दर सजी हैं । उन्होंने नीलांवर ओढ़ रखा है। रति-काम केली क्रीड़ा (नित्य विहार) के रस में सराबोर होकर वे विहार कर रही हैं ।
बिहारी तेरे नैंना रूप भरे - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (43)
श्री ललितमोहिनी देव कह रहे हैं "हे बिहारी जू, आपकी आँखों में श्री किशोरी जू की छवि समाई हुई है, जिनका दर्शन कर कर आपकी इन आँखों को कुछ और दिखाई नहीं पड़ रहा।"
मान न कीजै प्रान पियारी जू - श्री ललित मोहिनी देव जू, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (53)
श्री ललित मोहिनी देव जू कह रहे हैं "हे श्री प्राण प्यारी जू, आप मान ना कीजिये, आप मेरे जीवन की प्राण हैं, आपके ही बल से मैं आप पर बलिहारी जाती हूँ।
आजु बधाई श्रीवृन्दावन - श्री ललित मोहिनी देव जू, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (63)
श्री ललित मोहिनी देव जू कह रहे हैं "आज श्री वृन्दावन में बधाई है, क्यूँकि आज श्री बिहारी बिहारिणी जू कुञ्ज महल में क्षण प्रतिक्षण केलि लीला परायण हैं।
जै जै कुंजबिहारिनी प्यारी - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, रस के पद (61)
श्री कुंजबिहारिनी,प्यारी जू, श्री राधा जी की जय हो जय हो ।
जो कुंजमहल में केलि लीला का सुख देने वाली है, उन बिहारिन जी की जय हो जय हो।
जै जै कुँजबिहारिनि प्यारी - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, रस के पद (61)
श्री ललितमोहिनी देव जी कहते हैं, "श्री कुंजबिहारिनी प्यारी श्री राधा की जय हो जय हो । कुंजबिहारिनी जी, जो रसिको की सिरमौर है, उनकी कृपा पाकर मै धन्य हो गया हूँ ।
यह आनंद कहौ न परे री - श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (48)
वृंदावन का परम आनंद ("नित्य विहार") शब्दों में नहीं बताया जा सकता। श्री ललित मोहिनी देव कहते हैं कि जब भी मै श्री राधा कृष्ण की जोड़ी को देखता हूँ तो मेरी आंखें आनंद रस से भर जाती है।