श्री दामोदर दास

श्री दामोदर दास, श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के वृंदावन के एक रसिक संत।

25 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री वृन्दावन छांडिकै जो कहू - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (18)

    यदि मैं श्री वृंदावन धाम को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर चला जाऊँ, तो मैं दृढ़तापूर्वक घोषित करता हूँ कि तुम मुझे इस अनन्य निष्ठा से भटका हुआ पतित समझकर दामोदर नाम से कदापि न पुकारना अर्थात् मेरा अस्तित्व, पहचान और जीवन सब कुछ श्री वृन्दावन से ही जुड़ा हुआ है।

  2. अंवर कंवर जौ जुरै रुखौउ उत्तम भोग - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (19)

    चाहे पहनने को वस्त्र और ओढ़ने को कंबल, और खाने को उत्तम अथवा रूखा भोग मिले या न मिले, तथा सुख-दुःख जैसे भी संयोग हों, कैसी भी परिस्थिति हो, वृन्दावन में सदा पड़े रहना ही जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है।

  3. जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै - श्री हित दामोदर दास, फुटकर वाणी (172)

    जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं ।

  4. यह तन यह वन जमुन तट मिल्यौ वन्यौ है दाउ - श्री हित दामोदर दास, आशा त्याग (42)

    यह मानव देह, तथा वृन्दावन में यमुना तट का वास मिलना अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है। अतः सांसारिक आशाओं को त्यागकर, युगल किशोर का निरंतर भजन करना चाहिए।

  5. वासी की आसा करौ वासी हाथ विकाऊं - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (6)

    मेरी आशा वृन्दावन-वासियों पर ही है, मैं अपने को उन्हीं के हाथ समर्पित करता हूँ । अब मैं श्री धाम वृन्दावन को त्याग कर कहीं नहीं जाऊँगा।

  6. रैन रढौं पानी पियौ पातर सीथ चुगाउं - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (4)

    चाहे मुझे रातभर धरती पर ही सोना पड़े, केवल जल पीना पड़े और रूखा-सूखा अन्न ही भोजन में मिले, फिर भी मैं वृन्दावन को कभी नहीं छोड़ूँगा।

  7. कोउ कामी क्रोधी कहौ कोउ लोभी कहो नाऊं - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (9)

    चाहे कोई मुझे कामी कहे, क्रोधी कहे, अथवा लोभी कहे, परंतु मैं वृंदावन को छोड़कर कहीं और नहीं जाऊँगा, चाहे कोई मेरी कितनी ही निंदा करे।

  8. लाज तजौ मसकत करो यौ निर्वाह कराउं - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (11)

    मैं समस्त प्रकार की लज्जा का त्याग कर, चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न सहनी पड़ें, श्रमपूर्वक अपने जीवन का निर्वाह कर लूँगा, परंतु मैं वृंदावन को छोड़कर कभी कहीं और नहीं जाऊंगा।

  9. अन्न धन भंडार भर दे - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (12)

    चाहे मुझे अन्यत्र स्थान में अन्न, धन आदि के भंडार अथवा सोने के महल ही क्यों न दिए जायें, परंतु मैं श्री वृंदावन को त्याग कर कभी कहीं नहीं जाऊंगा।

  10. जो बोलौ तो साच कहौं नातर बोलौ नाहि - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (23)

    यदि बोलूँगा तो केवल सत्य ही बोलूँगा, नहीं तो मौन रहूँगा, और किसी की भी कभी निंदा नहीं करूँगा। इस दृढ़ संकल्प के साथ, मैं सदैव वृंदावन में वास करने का व्रत लेता हूँ।

  11. नेह तजौ घर की घरन - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (15)

    हे मन! घर-परिवार के मोह को छोड़ दे, और सेवकों का साथ भी त्याग दे। मेरी यही प्रतिज्ञा है कि मैं श्रीधाम वृंदावन को छोड़कर अन्यत्र नहीं वास करूँगा।

  12. मारौ मोहि तारौ कोउ, सब दुतकारहु गाऊं - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (14)

    भले ही कोई मुझे मारे अथवा पार लगाये, सब को दुतकार के मैं सदा वृंदावन के गुणों को गाऊँगा। मेरी यही प्रतिज्ञा है कि मैं श्रीधाम वृंदावन को त्याग कर कहीं और नहीं जाऊँ।

  13. कुँज कुँज निरखत फिरौ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (3)

    मैं श्री वृन्दावन में विचरण करते हुए विभिन्न कुंजों को निहारा करूँगा एवं यमुना जल में स्नान करूँगा। श्री वृन्दावन को छोड़कर मैं कभी भी कहीं और नहीं जाऊंगा।

  14. वृंदावन सुखरासि है, आनंद ठाऊँ ही ठाऊँ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (5)

    श्री वृंदावन धाम सुख की राशि है, जहां ठौर ठौर में आनंद ही आनंद है । मेरी यही अभिलाषा है कि ऐसे श्री वृंदावन धाम में विराजित श्री राधा वल्लभ लाल को त्याग कर मैं अन्यत्र कहीं भी न जाऊँ ।

  15. सिर काटौ पावक जरौ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (10)

    भले ही मेरा सिर काट दिया जाए, आग में झोंक दिया जाए, पानी में डुबो दिया जाए, या जहर पीने के लिए मजबूर किया जाए, फिर भी मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं श्री धाम वृन्दावन को कभी नहीं त्याग कर जाऊँगा ।

  16. कोऊ कामी क्रोधी कहौ, कोउ लोभी कहौ नाऊँ - श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (9)

    कोई चाहे मुझे कामी कहे, क्रोधी कहे अथवा लोभी नाम से पुकारे, परंतु मैं श्री वृंदावन का त्याग कर किसी भी अन्य जगह नहीं जाऊँगा ।

  17. जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै - श्री हित दामोदर दास

    वृंदावन वास की ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि किसी को वृंदावन वास मिल जाये और उसके पहाड़ के समान भी पाप हों, तो भी सहजता से यहाँ डोलने से नष्ट हो जाते हैं ।