लाड़ो तुम ही हो मम भाग - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (43)
हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।
श्री हित गोपाल दास वृन्दावन के राधा वल्लभी सम्प्रदाय के एक विरक्त संत थे जिन्होंने अपने जीवन काल में अनन्य रूप से वृंदावन के सेवा कुंज में भजन किया। इन्होंने अनन्य रूप से श्री राधा का भजन किया एवं सेवा कुंज में सोहनी सेवा, जल सिंचन एवं पुष्प सेवा में निरंतर संलग्न रहते थे । आपके द्वारा रचित ग्रंथ श्री निकुंज रस वल्लरी श्री राधा के चरणों में आपके अनन्य प्रेम को दर्शाता है ।
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हे लाड़ली (श्री राधा)! आप ही मेरा परम सौभाग्य हैं। मैं सेवाकुञ्ज में आपको खोजती हुई भटकती रहती हूँ, न जाने कब मेरे हृदय में आपके प्रति पूर्ण अनुराग जागृत होगा।
हे श्यामा जू! मुझे केवल आपके चरण-कमलों की ही आशा है। हे श्री वृन्दावन की स्वामिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे अपने समीप ही स्थान दीजिए। जहाँ यमुना जी का प्यारा तट सुशोभित है और आपका अपना निज-खास स्थली श्री सेवाकुञ्ज है, वहीं मुझे वास दीजिए।
निशदिन राधा‑नाम का ही भजन करना चाहिए। जब कोई मुझे यह नाम सुनाता है, तभी मेरे हृदय को वास्तविक शांति (चैन) मिलती है।
वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बार-बार जय हो। उस परम मनोहर श्री धाम वृन्दावन की जय हो, जहाँ लताओं, कुंजों और पुष्पों की सुगन्धित फुलवारी सदा शोभायमान रहती है।
हे श्यामाजू! मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा। तुम तो मेरे मन की समस्त बातों को जानती हो, फिर मैं तुम्हें क्या बताऊँ?
हे राधे! मैं तुम्हारे द्वार पर आन पड़ी हूँ । हे वृषभानु नंदिनी! तुम्हें छोड़कर अब मैं किसे पुकारूँ? मैं संसार-सागर में डूब रही हूँ, कृपया अपनी कृपा की नाव से मुझे पार लगा दो।
श्री राधारानी अलबेली सरकार हैं — वे सम्पूर्ण वृन्दावन की अधिष्ठात्री महारानी हैं, रसिकों की जीवन-प्राण हैं, परम उदार एवं अत्यन्त सुकुमार हैं।
हे श्यामा (राधा), अब मैं आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। आपकी याद मुझे हर क्षण सताती रहती है एवं आपकी नित्य स्थली सेवाकुंज मेरे हृदय को अत्यंत मनोहर लगती है।
हे प्रिया जू (श्री राधा)! मैं तुम्हारे चरण कमलों की दासी हूँ। मैं कब से कुञ्ज के द्वार पर आपकी प्रतीक्षा में खड़ी हुई हूँ, कृपा कर ब देर न करो।
वृंदावन छोड़ कर कहीं भी आनंद नहीं है । मनोहर यमुना, सुंदरयुगल सरकार श्री प्रियतम-प्यारी (राधा-कृष्ण), एवं कदंब की छाया आदि अति मन मोहक है।
हे सखी! देखो, आज श्री राधा प्यारी अपने प्रियतम श्री कृष्ण के संग सेवाकुंज की सघन लताओं से प्रेम और सुख की अमृतवर्षा करती हुई आ रही हैं।
हे नवल-नवेली श्रीराधा! अब मुझ पर कृपा कीजिए, सेवाकुंज और निकुंज के भवन की मैं लता, फूल एवं बेली बन जाऊं।
हमारी प्रिया श्री राधा अत्यंत छबीली और मनमोहिनी हैं, जिनकी छवि का स्मरण करने और दर्शन करने मात्र से सभी प्रकार की बाधाएँ स्वतः ही दूर हो जाती हैं।
हे श्री राधे, मेरी लाज आपके हाथ है। हे ब्रज की चूड़ामणि, हे करुणामयी, आपके बिना संसार में मेरा और कोई नहीं है।
हे श्री वृंदावन धाम के प्यारे अनन्य रसिकों! आप ही मेरे प्राणों के सच्चे रक्षक हैं। मुझे ऐसी कृपा प्रसादी दीजिए कि मैं भी इस अद्भुत रसोपासना मार्ग का अधिकारी बन सकूँ।
मैंने निरंतर श्री राधा नाम की रटना लगायी है । मेरी पलकों में एवं अलकों में श्री राधा है, मैंने अपनी माँग श्री राधा नाम से भर ली है।
हे मन, श्री वृन्दावन को चल, जहाँ सरस एवं सुखद श्री यमुना जी अति शोभायमान हैं, जिनका जल कल-कल करता हुआ बहता है।
हे राधे, मैं सदा-सदा की आपकी दासी हूँ। कृपया मुझे अपने महल की टहल प्रदान कर, मेरे भाव का पोषण कीजिए एवं, मुझे अपनी निज सेवा प्रदान करें।
हे करुणामयी स्वामिनीजू (श्री राधे), मैं तो आपकी शरण में आ गई हूँ । हे श्री कृष्ण की प्राण वल्लभा! मेरे मन को आपके महल की टहल पूर्ण रूप से भा गई है ।
हमारी लाड़ली श्री राधा अति ही भोली हैं। वृषभानु नंदिनी अपने शरण में आये हुए के अवगुण नहीं देखती, वे परम कृपामयी हैं।