आजु बनी अति सारंग नैनी - श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी
सारंग के समान नेत्रों वाली श्रीराधा आज अत्यंत सुंदर बनी हैं। कामदेव को भी मोहित करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा के सौंदर्य में पूर्णतः रच-पचकर, उनके बालों की वेणी सजाने में लगे हैं।
श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी में ब्रज की विभिन्न लीलाएं, श्री राधा कृष्ण की निकुञ्ज लीला, बधाई, उत्सव, आदि के पद संकलित हैं, जिसकी रचना अष्ठछाप कवियों में से एक श्री गोविन्द स्वामी जी ने की है।
26 लेख उपलब्ध हैं
सारंग के समान नेत्रों वाली श्रीराधा आज अत्यंत सुंदर बनी हैं। कामदेव को भी मोहित करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा के सौंदर्य में पूर्णतः रच-पचकर, उनके बालों की वेणी सजाने में लगे हैं।
आज श्री कुंजेश्वरी रानी, श्री राधा, परम सुशोभित हो रही हैं। उनके बिखरे केश, सुगंधित पुष्पों से सजी हुई सुंदर वेणी में गुँथे हुए, मंद-मंद लहरा रहे हैं।
गिरधारी लाल कुंजबिहारी श्री कृष्ण इतने सुन्दर हैं की उनके अंग-अंग पर करोड़ों कामदेव न्योंछावर हैं।
जिस पथ को पाने के लिए महामुनि नयन और नासिका को मूँदकर ध्यान करते हैं । वेद, जिसके भेद को न पाकर पछताते हैं ।
श्री प्रिया प्रियतम कुंज मंडप में बैठे हैं । श्री कृष्ण चन्द्र दूल्हा बने हैं और श्री राधिका दुल्हन ।
ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता विधि से अनभिज्ञ है । श्री कृष्ण के सुन्दर वदन का पान करने के लिए उन्होंने मेरे रोम-रोम में आँखें नहीं दी, यह बात उचित नहीं है ।
मनमोहन के रस में मतवाला होकर मैंने लोक-लाज और कुल की मर्यादा का पूर्णतः त्याग कर दिया है। अब कोई यश करे या अपयश—मुझे किसी की परवाह नहीं।
श्री बांके बिहारी का आसन एवं सिंहासन बाँका है और बाँके तकियों की छवि भी सुंदर है !
नित्य दंपति श्री श्यामाश्याम कुंजमहल में विराजे हैं । समस्त श्रृंगार से परिपूर्ण दोनों एक सेज पर एक-दूसरे के कंठ में भुजा डाले बैठे हैं ।
श्री वृन्दावन के इस अद्भुत विलास में मेरे मन ने अति सुख पाया है। जब मेरे प्रभु श्री श्यामसुंदर की मुझे प्राप्ति हो गई, तब मेरी समस्त आशाएँ पूर्ण हो गईं।
नवल बिहारी श्री कृष्ण आज अपनी प्राण-प्यारी वृषभानुनंदिनी श्री राधा के संग झूला झूल रहे हैं ।
श्री श्याम सुंदर जो काले [श्याम] वर्ण के हैं , मन को सुहाने वाले मोहन, काली कालिन्दी (यमुना) के तट पर आए ।
सुन्दर रंगों से चित्रित झूले पर श्री राधा कृष्ण झूला झूल रहे हैं। अलग-अलग वर्णों के वस्त्र धारण किये हुए सखियाँ उनके चारों ओर खड़ी हैं।
श्री गोविन्द स्वामी किसी सखी से कहते हैं "अरी सखी, श्री राधा कृष्ण निकुंज में विश्राम कर रहे हैं, इस समय वहां किसी का भी आना जाना नहीं होता।"
मैं वैकुंठ जाकर क्या करूँगा जहां न वंशीवट है, न यमुना जी हैं, न गोवर्धन है और न ही नंद की गाय हैं ।
मुझे तो एकमात्र ब्रज के लाड़िले श्री कृष्ण से ही काम है। मुझे यश और अपयश का कोई भय नहीं है, यदि मुझे कोई बुरा कहे या भला, आज कुछ भी कहे, मुझे अब किसी की कोई परवाह नहीं है ।
आज श्री कृष्ण पीले कुंडल, पीले नूपुर एवं पीला ही पीताम्बर ओढ़ कर खड़े हैं । उनकी कटि काछनी भी पीली है जिसके पट का छोर भी पीला है ।
लाल जी [श्री कृष्ण] की आँखें लाल हैं और उनके मुख में लाल पान का बीड़ा है। लाल जी की कमर में लाल कछनी बँधी है और सिर पर लाल वस्त्र बँधा है।
श्री कृष्ण गह्वर के भीतर चलते हैं जहाँ मोर मधुर स्वर में बोल रहे हैं । समस्त गह्वर वन के सभी वृक्ष फल फूल रहे हैं और कोयल मधुर स्वर से गान कर रही है ।
श्री श्यामाश्याम अपने श्री मुख को मुख से मिला कर आईने में अपनी छवि देख रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूर्णिमा का चंद्र एक पूर्ण विकसित नीले कमल के साथ उत्पन्न हो गया है।