जय हो सदैव श्री गोविन्ददेव - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (1)
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
श्री हरेकृष्ण जी, जिनका पूरा नाम डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानंद सरस्वती जी है, वृंदावन धाम के एक रसिक संत थे।
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श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
जब घनश्याम (श्री कृष्ण) अपनी मुरली की मधुर तान छेड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हैं, तब उनकी वह मुस्कान ऐसी प्रतीत होती है मानो गहरे नीले बादलों (श्याम शरीर) के बीच बिजली (दमक) चमक रही हो।
हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए।
जैसे-जैसे श्री राधा महारानी जू अपने तीखे और कजरारे नेत्रों की कमान तानकर प्रियतम की ओर निहारती हैं, वैसे-वैसे श्यामसुंदर का माधुर्य और भी अधिक निखर कर सामने आता है।
गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है।
देश-देशान्तर के अनेक व्यक्ति यहाँ खिंचे चले आते हैं, जिनके हृदय में प्रेम की प्रज्वलित ज्वाला धधक रही है।
श्री श्यामसुन्दर के चंचल नेत्रों की अनुपम शोभा को देखकर खंजन पक्षी और हिरण लज्जित होकर दिन-रात जंगल में रहने लगे । इसी प्रकार, मछली और कमल भी उनके नयनों की तुलना में स्वयं को तुच्छ पाकर जल के भीतर छिप गए। भाव यह है कि श्री कृष्ण के नेत्रों की सुंदरता के समक्ष संसार की समस्त सुंदर उपमाएँ फीकी पड़ गई हैं।
जब प्रेम के मार्ग पर एक बार चरण रख दिया, तब फिर उसमें मिलने वाले दुःखों से क्यों भयभीत होना? इस मार्ग में जल और भोजन की कामना तक छोड़नी पड़ती है, और निःसंकोच तलवार के नीचे सिर धरकर चलना पड़ता है।
टेढ़ी भृकुटि मानो एक दुर्ग (किला) के समान है और नेत्र उस दुर्ग की बंद कोठरी हैं। श्री राधा की कृपा-दृष्टि के बिना गोकुलचन्द (श्री कृष्ण) के दर्शन कदापि नहीं हो सकते।
श्री धाम वृन्दावन में कीर्तन-मंडलियों को देखकर हृदय में उमंग उठती है। गोवर्धन पर दृष्टि पड़ते ही गोवर्धन-धारण करने वाले कृष्ण की स्मृति हो जाती है।
यदि स्वप्न में भी कोई दुखी जीव आह भरकर उन्हें पुकारता है, तो वे (श्रीकृष्ण) शेषनाग और गरुड़ आदि को भी त्यागकर उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं।
इस धराधाम पर श्रीकृष्ण ने किसी भी गोपी को उतना नहीं अपनाया, जितना उन्होंने उस एक गोपी (श्रीराधा) को अपनाया, जिन्हें अपने साथ वे रास में अकेले ले गए। इस रहस्य को वेद भी नहीं जान सके।
ब्रजवासी साधारण लोग नहीं, सभी देवता ही हैं — ऐसी भावना हम हृदय में जागृत कर रहे हैं । दीर्घकाल की प्रतीक्षा के बाद, अब मेरे प्रभु धीरे-धीरे मेरे समीप आ रहे हैं!
जिन्होंने अपने आधे वचनों के अमृत से व्रजराज श्रीकृष्ण को अपने वशीभूत कर लिया, ऐसी श्रीराधा की जय हो। जिनकी कृपा से देवताओं और किन्नरों के भी समस्त कार्य सिद्ध होते हैं, ऐसी प्रेमस्वरूपिणी, ब्रज की प्राणेश्वरी, श्रीराधा की जय हो!
श्रीकृष्ण के कानों में सुंदर कुंडल हैं और सिर पर मोरपंख मुकुट दमक रहा है। उनके घुंघराले सुंदर केश और उन्हें सुंदर रूप से सँवारे हुए श्री कृष्ण की जय हो।
क्या ये वृंदावन के साधारण वृक्ष हैं, या स्वयं स्वर्ग के पारिजात वृक्ष हैं? क्या ये शाखाएँ हैं, या किसी दिव्य प्रेम के अंजन से अभिषिक्त दिव्य शलाकाएँ?
यहाँ के तालाब (तड़ाग), बाग-बगीचे, फूल और फल सब मोहन (मन को मोहित करने वाले) हैं। यहाँ की गायें, पर्वत और गोवर्धन भी मोहन हैं।
नाथ! मुझमें ध्रुव के समान ऐसी शक्ति नहीं कि अखंड तप कर सकूँ, और न ही प्रह्लाद के समान ऐसी भक्ति है कि निरंतर भगवद् नाम का स्मरण कर सकूँ।
जहाँ श्रीकृष्ण के नाम-संकीर्तन की गूंज दिशाओं में अनवरत व्याप्त हो रही है। सुनो! यमुना के पावन जल की वह मधुर सरसराहट, जहाँ श्रीकृष्ण की बांसुरी की दिव्य तान नित्य गुंजायमान रहती है।
स्वर्ग में कहाँ “राधे राधे” की मधुर धुन सुनाई देती है? स्वर्ग में कहाँ हैं वे मनमोहक कुंज एवं वन?