बैठे दोउ झूलत कुंज हिंडोरें - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (386)
श्री राधा-कृष्ण दोनों कुंज के हिंडोले पर बैठे हुए झूल रहे हैं। उस समय वन के सारे वृक्ष और लताएँ फूलों से लदी हुई हैं तथा आकाश में घने बादल उमड़कर सुंदर वर्षा कर रहे हैं।
श्री कुम्भनदास जी की वाणी में ब्रज की विभिन्न लीलाएं, श्री राधा कृष्ण की निकुञ्ज लीला, बधाई, उत्सव, आदि के पद संकलित हैं, जिसकी रचना अष्ठछाप कवियों में से एक श्री कुम्भनदास जी ने की है।
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श्री राधा-कृष्ण दोनों कुंज के हिंडोले पर बैठे हुए झूल रहे हैं। उस समय वन के सारे वृक्ष और लताएँ फूलों से लदी हुई हैं तथा आकाश में घने बादल उमड़कर सुंदर वर्षा कर रहे हैं।
हे सखी! मेरा मन तो अब श्री कृष्ण के संग ही चला गया है। इसमें किसी और का कोई दोष नहीं है, यह तो मेरे इन नेत्रों की ढिठाई है जिन्होंने मुझे पर-बस (श्यामसुन्दर के अधीन) कर दिया है।
हे सखि! गिरिधर पिय के हृदय में बसने वाली श्री राधिका के बदन की छवि अत्यंत सुंदर है। उनके एक अंग की शोभा के सामने तो करोड़ों चंद्रमा-सूर्य भी फीके पड़ जाते हैं।
दिव्य दंपति श्रीराधा-कृष्ण कुंज-भवन में विराज रहे हैं। कृष्ण के सिर पर पीली पगड़ी बँधी है, कटि पर पीला पट है, और कर्णों में सुंदर कुण्डल शोभा दे रहे हैं।
ब्रज रस की अद्भुत गति को मैंने नाच-नाच कर प्राप्त किया है। वृन्दावन में रास-विलास में निरंतर रस की वृद्धि हो रही है।
नंदनंदन श्री कृष्ण पर बार-बार बलिहारी जाइए । श्यामसुंदर की मनोहर छवि को निहार-निहार कर सुख का पान कीजिए।
श्री राधा के संग प्रियतम श्री कृष्ण सुंदर हिंडोरे में झूल रहे हैं जिनके चारों दिशाओं में ब्रज की युवतियाँ सजी हुई हैं और वे धीरे धीरे झूला झुला रही हैं ।
हे प्यारी जू [श्री राधे], तुम्हारे नयन तो अगाध रस एवं सौंदर्य की सीमा हैं ! मेरा ह्रदय यही कहता है कि अब मैं तुम्हारे नयनों से अपनी दृष्टि को नहीं हटाऊँगा ।
सुंदरता की निधि नागरी श्री राधा का प्राकट्य हुआ है । जिनकी रूप-माधुरी का नेत्रों से पान कर सखियाँ हर्षित हो रही हैं, उन श्री राधा के सुंदरता की कहीं कोई उपमा नहीं है ।
ही अलबेली राधिका, तू अलक लड़ी [लाड़ लड़ाने योग्य] है । तू तो नित्य प्रति श्री गिरिधल लाल [श्री कृष्ण] के ह्रदय में गड़ी रहती है ।
अरे सखी! मैं तो बस गिरिधर का ही गुणगान करता हूँ । मेरा तो बस यही व्रत है, मुझे और कुछ भी रुचिकर नहीं है ।
श्री कुम्भनदास जी सखी भाव में भावाविष्ट कह रहे हैं "मनमोहन श्री कृष्ण जब संध्या समय गायों के साथ लौटते हैं तब उनकी सुन्दर छवि मेरे मन का हरण कर लेती है। मैं तो अपने घर में बैठी थी लेकिन श्री कृष्ण का दर्शन करते ही मैं सुध-बुध खो बैठी तथा अपने सर पर ओढ़नी रखना भी भूल गयी।"
श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे कुँवरि राधिका जू, आप समस्त सौभाग्य की सीमा हो, आपके इस स्वरुप पर मैं करोड़ों करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। मेरे मन में यह विचार भी आ रहा है की आपके नयन कमलों पर करोड़ों करोड़ों खंजन पक्षी तथा मृगों को न्योछावर कर दूँ, जिनके नेत्र विश्व में सबसे सुन्दर माने गए हैं।"
हे सखी, अब वर्षा ऋतु का ब्रज में आगमन हुआ है। मेंढक, मोर और सारिकाएँ सभी वन कुंजों में गा रहे हैं और बतखों की कतारें वृक्ष की शाखाओं के ऊपर से उड़ान भर रही हैं।
श्री राधा जू सखी से कहती हैं "हे सखी, वर्षा की बूंदें अचानक मुझ पर गिरने लगीं। मैं सो रही थी, अपने प्रियतम श्री श्यामसुंदर के सुन्दर चिंतन में, उसी समय बादल ज़ोर से गरजने लगे और मैं जाग गयी।
देवदुर्लभ अचिन्त्य प्रेम रस की मूल स्रोत श्री राधिका जू पूरी तरह से अपने दिव्य स्नेह और चंचल मन के आनंद में डूबी हुई हैं। श्री वृषभानु नन्दिनी श्याम वर्ण के तमाल वृक्ष के चारों ओर लिपटी एक सुनहरी बेल के समान हैं ।
श्री कृष्ण श्री राधा के संग रंग महल में विराज रहे हैं। रंग महल में तीन द्वार हैं जिसमें रंगीन परदे लगे हुए हैं। कई रंगों के अनमोल रत्नों से जटित एक अंगीठी से झिलमिल झिलमिल रौशनी प्रकट हो रही है।
भक्तों को किसी राज महल से क्या प्रयोजन है ? (यहाँ सीकरी का अर्थ अकबर के फ़तेहपुर सीकरी से है, जब श्री कुंभन दास जी को अकबर ने अपने राज महल न्यौता भेजकर बुलाया था, उस समय का यह पद है )
श्री श्यामसुन्दर श्री राधिका जू के कुञ्ज में विश्राम कर रहे हैं। श्री ललिताजी और अन्य सखियाँ चंवर डुला रही हैं जिससे शीतल वायु बह रही है।
जहाँ-जहाँ महारानी श्री राधारानी और उनकी अष्ट-सखियाँ चरण रखती हैं, वहाँ श्रीकृष्ण पहले उस भूमि को बुहारते (झाड़ू लगाते) हैं। ऐसी पावन भूमि—श्री राधाकुण्ड—की जय हो, जय हो।