श्री प्रेमदास जी [प्रेमसखी]

श्री प्रेमदास जी निम्बार्क संप्रदाय के वृंदावन के रसिक संत श्री लाल बलबीर के भ्राता हैं।

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  1. एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की - श्री प्रेम दास जी की वाणी (43)

    हे सुकुमारी (श्री राधा)! आप कुंज-बिहारी श्री कृष्ण के प्राणों की प्यारी हैं। मेरी अल्पता को जानकर अपनी कृपा-दृष्टि मुझ पर डालिये।

  2. श्रीगुरु दीन दयाल जू यह अभिलाषा मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.1)

    हे दीनदयाल गुरुदेव! मेरी यह अभिलाषा है कि युगल-चन्द्र (राधा-कृष्ण) के चरण-कमलों की छवि मेरे मन रूपी भौंरे की गति को चुरा ले, अर्थात् मेरा मन सदा उन श्रीचरणों की मधुरता में ही निमग्न रहे।

  3. प्यारी नख चन्दन कौं कीजिये चकोर मन - श्री प्रेम दास जी की वाणी (93)

    ऐसी कृपा हो कि मेरा मन प्यारीजू (श्री राधा) के नख-चंद्रिका में चकोर बन जाए, या मुझे राधेजू के मधुर यश का निरंतर गान करने वाली कोयल बनने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए।

  4. यह रस रसिकन के लिये रसिकहि रस बरसंत - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (106)

    प्रिया प्रियतम का यह दिव्य रस रसिकों के लिए ही है, और इस रस की वर्षा भी केवल उन्हीं पर होती है जो वास्तविक रसिक हैं। केवल रसिकजन ही इस अनमोल रस-रत्न के वास्तविक पारखी होते हैं, अत: रसिकों के लिए नित्य ही वसंत होती है ।

  5. ऐसी प्रीति देउ किन प्यारी - श्री प्रेम दास जी की वाणी (113)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझे ऐसी अनन्य प्रीति प्रदान करें कि मैं क्षण-क्षण, हर पल आपके चरणकमलों का ही केवल अवलोकन करती रहूँ और मैं सदा-सर्वदा आपकी होकर रहूँ।

  6. श्रीवृन्दावन-चन्द्र छवि श्रीराधा वर नाम - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.2)

    श्री वृंदावन की मनमोहक छवि और सर्वश्रेष्ठ "श्री राधा" नाम सदा रसिकों के हृदय में गूंजता हुआ विराजमान रहता है जो परम पावनता और सुंदरता का सार स्वरूप है।

  7. मैं दरसन बिन अनमनी, बैठोंगी मुख मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.4)

    श्री राधा के दर्शन प्राप्त न होने पर मैं व्याकुल होकर उनसे प्रेम में मान कर, मुख मोड़कर बैठूँगी। ऐसा कब होगा कि तब मेरी लाड़ली (राधा) आकर मुझसे कहेंगी, “तुम्हारा हृदय क्यों व्याकुल है, तुम क्यों मुझसे रूठी हुई हो?”

  8. किशोरी मोहि श्रीवन वास बसावौ - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (91)

    हे किशोरी श्री राधे, मुझे श्री वृंदावन का वास प्रदान कीजिए, जहाँ मैं सदा आपके चरण-कमलों की दासी बनकर रह सकूँ। कृपा कर मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिए।

  9. नमो नमो वृंदाविपिन - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता)

    मैं श्री वृंदावन धाम की परम पावन भूमि को बार-बार नमन करता हूँ, जो आनंद की राशि है । मैं सभी ब्रजवासियों को बार बार नमन करता हूँ, उन्हींके चरणों का मुझे आसरा है ।

  10. इन कुंजन विहरत नित ही नित - श्री प्रेम सखी जी

    वृंदावन के इन कुंजों में श्री राधा कृष्ण नित्य ही विहरण करते हैं । सेवा कुंज अद्भुत छवि को बरसाता है, जहां जहां भी दृष्टि जाती है वहीं ह्रदय प्रेम से रोमांचित हो उठता है ।

  11. जिनके मुख नहीं निसरत राधे - श्री प्रेम सखी जी

    श्री प्रेम सखी जी कहते हैं कि जिसके मुख से "श्री राधे" नाम नहीं निकलता, उसका मुख कुत्ते और सूअर के समान है। ऐसे व्यक्ति का दर्शन परमार्थ के मार्ग में बड़ी बाधा उत्पन्न करता है, और यह बाधा प्रयास करने पर भी दूर नहीं होती।