सिद्धांत के पद [श्री ललित किशोरी देव]

सिद्धांत के पद, ग्रंथ श्री ललित किशोरी देव जी की वाणी में श्री ललित किशोरी देव द्वारा लिखित सिद्धांत के पदों का संकलन है। रचैयता: श्री ललित किशोरी देव

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  1. मोहि भरोसौ स्वामी जी को - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (91)

    मुझे तो ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी पर विश्वास है । उनकी करुणा ऐसी है कि वे जिस पर कृपा करते हैं, उसे भी अपने समान बना लेते हैं । अर्थात् जिस प्रकार वे स्वयं श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करते हैं, वही सेवा का अधिकार वे अपने कृपापात्र को भी दे देते हैं। उनके प्राणों का आधार युगल नित्य विहार है ।

  2. वनराज हमारे प्यारे हैं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (91)

    वनों का राजा, श्रीधाम वृंदावन हमको (रसिकों को) अत्यंत प्यारा है। यह इस भूतल पर नित्य सदा विराजता है एवं दिव्य प्रेम-रस का मूल स्रोत है।

  3. मेरे प्रान जीवन धन राधे - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (135)

    मेरी प्राण जीवन धन कुंजबिहारिणी श्री राधे हैं जो महाप्रेम रस की राशि हैं एवं अद्भुत अगाध रूप माधुरी का वर्षण करने वाली, रसिकों की चूड़ामणि अनन्य आराध्या हैं ।

  4. भजि लै कुंज बिहारिनि बाल - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (96)

    श्री कुंजबिहारिनी [श्री राधा] का भजन करो जिनका स्वरूप अति ​​अद्भुत है, जो प्रेम रस में सराबोर हैं एवं जिनके विशाल नेत्रों की चितवनी अति बाँकी (तिरछी) है ।

  5. प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (121)

    श्री प्रिया जू (श्री राधा) की चितवन सहज में ही प्रेम प्रदान करने वाली है । एक नयन कटाक्ष ही चित्त को हर लेता है, प्राणों में आनंद का संचार करता है एवं उसमे विभिन्न रंग भर देता है, जिससे सखियाँ अपनी देह की सुधि भूल जाती हैं ।

  6. लडैती तेरी कृपा कहिय न जाइ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (139)

    लड़ैती जू (श्री राधा जू) की कृपा कहते नहीं बनती, जो हर क्षण मुझे अपनी कृपा दृष्टि से पोषण कर अपने अति अद्भुत रस का वर्षण करती हैं जिसका अपार आनंद मेरे ह्रदय में समाता नहीं ।

  7. लड़ैती मेरी प्रानजीवन धन प्यारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (144)

    श्री लड़ैती जू [राधा] ही मेरी प्रान जीवन धन प्यारी हैं । मेरा तन भी श्री राधा है मेरा मन भी श्री राधा है, एक क्षण को भी श्री राधा रानी मेरे से विलग नहीं होती ।

  8. बिहारिनी संग निरंतर मेरें - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (104)

    हमारा प्रेम का सम्बंध केवल अति उदार चूड़ामणि श्री कुंजबिहारिनी प्यारी ज़ू [राधा रानी] से ही है जिनकी कृपा की वांछा नित्य ही श्री लाल जी [श्री कृष्ण] भी करते रहते हैं और इन्हें निहार कर ही जीवित रहते हैं ।

  9. हमारौ मेल मिलाप है तो सों प्यारी - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (160)

    हमारा मेल मिलाप [प्रेम का सम्बंध] केवल अति उदार चूड़ामणि श्री कुंजबिहारिनी प्यारी ज़ू [राधा रानी] से ही है और श्री प्यारी ज़ू के गर्व में ही हम नित्य भरे हुए हैं ।

  10. साधो भाई ऐसौ महल हमारौ - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (101)

    हे साधु भाई, हमारी श्री राधा का निज महल ऐसा अद्भुत है जिसपर समस्त सगुण उपासना एवं निर्गुण उपासना को वारा जा सकता है, जिसे वेद भी कहने में असमर्थ हैं ।

  11. महल हमारे गुदी परयौ है - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (53)

    श्री वृंदावन निकुंज महल मेरे मन के पीछे पड़ गया है, यदि किसी कारण वश मैं भूलना भी चाहूँ तो यह निज महल मेरे तन, मन एवं वचनों के आगे सदा काल ही विराजमान रहता है ।

  12. तो सी तुही हरिदास दुलारी - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (55)

    हे प्रानजीवनघन, श्री हरिदासी जी की प्राण प्यारी श्री राधा जू ! आपके समान एकमात्र आप ही हैं ! स्वयं श्री कुंजबिहारी लाल जू आपके प्रेसरस में सतत विवश हुये रहते हैं । आपकी समानता कोई कैसे ही कर सकता है ।

  13. हमारे धन वृन्दावन प्यारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (159)

    हमारा एकमात्र धन श्री वृंदावन धाम की लाड़िली श्री राधिका प्यारी ही हैं । यह ऐसा अद्भुत नित्य धन है जो जितना पान करो वह कभी भी कम नहीं होता, किन्तु नित्य प्रति बढ़ता ही जाता है एवं अपनत्व बढ़ता ही जा रहा है ।

  14. लडैती जू को महल महा सुखरासी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (69)

    श्री लाड़ली जी [श्री राधिका जू] का महल अत्यंत सुख प्रदान करने वाला है, जिस भाँति भी वह चाहती हैं उसी प्रकार वह केली विलास करती हैं एवं हम सखियों को रस देती हैं । प्रत्येक क्षण नया नया रस बरसता है एवं हमारा तन मन रोमांचित हो उठता है ।

  15. राधे रसिक सिरोमनि रानी - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (68)

    श्री राधे रसिकों की सिरमौर रानी हैं । श्री राधा अदभुत प्रकार के रूप और रस का सागर हैं जो नित्य ही जनों को महा प्रेम सुख प्रदान करने वाली हैं । इस नित्य विहार रूपी रस में नित्य मिलन है एक क्षण का भी वियोग नहीं, परंतु मिलने की चाह नित्य ही बड़ती जाती है ।

  16. श्री हरिदास शरण जे आये - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (52)

    जो भी श्री हरिदास जी (श्री ललिता सखी अवतार) की शरण में जाता है उसे श्री कुञ्ज बिहारी श्री बांकेबिहारी जी महाराज अपना जान कर अपने निकट बैठा लेते हैं।

  17. सोई रहै महा आनंद में एक लाडिली जाहि राखै - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (99)

    वही जन ही केवल महा आनंद [रस में सराबोर] में रहता है जिसे प्राणप्यारी श्री राधारानी रखती हैं और कोई नहीं रह सकता । श्री राधा रानी की कृपा के बिना आप कोई भी उपाय कर डालो सब व्यर्थ है, गौर श्याम [युगल रस] रस आप आस्वादन ही नहीं सकते ।

  18. मेरी गति तुही है लडैती प्रानप्यारीजू - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (120)

    हे मेरी राधा रानी केवल आप ही मेरी गति हैं। आप अत्यंत मुझसे पसंद है एवं आप ही हैं जो मेरा हित जानती हैं, आप समस्त गुणों की खान हैं एवं परम उदार हैं ।

  19. तुव कृपा ते लाडिली तेरो सुख लहियै - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (32)

    ललित किशोरी देव श्री स्वामिनी जू से कह रहे हैं “हे मेरी प्राणजीवन श्री लाड़िली जू ! आपकी कृपा से ही आपका महासुख मुझे प्राप्त हो सका है।