सिद्धांत की साखी [श्री बिहारिन देव जी]

सिद्धांत की साखी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी का अध्याय है जिसमें श्री बिहारिन देव जी द्वारा सिद्धांत के दोहों को संकलित किया गया है।

64 लेख उपलब्ध हैं

  1. जायौ भौंड़ी भेड़ कौ कीनौं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (576)

    यदि कोई भेड़ का बच्चा (भोली भेड़) सिंह बनना चाहे, तो केवल इच्छा करने से वह सिंह नहीं बन सकता। सिंह तो वही बन सकता है जिसने अपने चारों ओर की सभी बाड़ें (बंधन और सीमाएँ) तोड़ दी हों। जो अनेक धर्मों-कर्मों, विधि-निषेधों, सांप्रदायिक विकृतियों अथवा बन्धनों में फँसा हुआ हो, वह सिंह के समान दृढ़ व्रत रखने वाले अनन्य रसिकों की भला क्या समानता करेगा। वास्तविक रसिक तो वही होता है जिसने समस्त बन्धनों को तोड़कर केवल एकमात्र प्रिया-प्रियतम से ही अनन्य सम्बन्ध जोड़ लिया हो।

  2. पंडित पढि पढि पचि मरे - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (321)

    न जाने कितने पंडित बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ते-पढ़ते जीवन भर उसी में उलझे रहे और अंततः अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ गँवा बैठे, परंतु वे प्रेम का एक भी वास्तविक अक्षर न पढ़ सके। वे केवल शुष्क शास्त्रीय ज्ञान का निरर्थक बोझ अपने सिर पर ढोते रहे, जिसके कारण उनके भीतर सच्चे विवेक का उदय न हो सका।

  3. नामी नाम न भावई - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (132)

    स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विहार के अतिरिक्त उन्हें अपना नाम सुनना भी सुहाता नहीं। श्री श्यामा-कुंजबिहारी का सर्वस्व और जीवन-प्राण केवल यह नित्य-विहार ही है।

  4. बलिहारी जाऊँ जक परी - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (660)

    हे बिहारीदास! श्रीमद्भागवत् के वर्तमान वक्ता मुख से तो अत्यंत सरस व्याख्यान करते हैं और बार-बार दण्डवत कर विनम्रता का प्रदर्शन भी करते हैं, किन्तु जो कुछ भेंट आती है, उससे अपनी देह-कुटुंब-परिवार का ही पालन-पोषण करते हैं। इसके विपरीत, श्री शुकदेव जी ने संपूर्ण भागवत् में संसार के विरक्ति और प्रभु-चरणों में अनन्य प्रीति का ही प्रतिपादन किया है। उन वक्ताओं की समझ पर आश्चर्य होता है जो श्रीमद्भागवत् के वास्तविक रहस्य से सर्वथा अनभिज्ञ हैं।

  5. काम न आवै कौन हूँ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (364)

    बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया गया सच्चा प्रेम ही काम आता है और वही माया-सागर से पार करा सकता है; अन्य कुछ नहीं।

  6. मनसा बाचा कर्मना - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (121)

    मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके पूर्ण वशीकरण में स्थित वह श्रीविहारिणीदासी प्रियाजू को नित्य सुख प्रदान करने वाली बनती है और श्री निकुंज-महल में सुशोभित होकर विराजमान रहती है।

  7. विभचारनि कौ संग तजि - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (186)

    यदि तुम व्यभिचारियों के संग को सर्वथा त्याग दो, एकमात्र निष्काम और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम का भजन करो, केवल उनके सुख में ही सुखी रहो, तो तुम्हारे हृदय रूपी घर में श्री युगल का प्रेम रूपी धन भर जाएगा।

  8. पाँडे माटी में सनैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (320)

    पंडित निपट-कोरे मिट्टी के समान इस कर्मकाण्ड में ऐसे उलझे रहते हैं जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं है। ऐसे बाह्य आडम्बरों से युक्त कर्मकाण्डी लोग सर्वोच्च प्रेम पदार्थ को कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

  9. श्रीबिहारीदास ब्रज में बसत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (365)

    प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन) करते हैं। प्रेम-विहीन बाह्य अपरस-सपरस के विचारों में उलझे रहने वाले सकामी जनों से तो वे सदा काल दूर रहते हैं, इसलिए वे लोग सदा दुखी बने रहते हैं।

  10. जेतो अन्तर वास में तेतो जानि उपास - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (603)

    श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। फिर भी यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि "हम तो इतने दिन से श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं, तो हमें तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ," तो श्री बिहारिन देव कहते हैं कि "हे भाई! तुम्हारा वास कुछ-कुछ तो सच्चा है, और कुछ तुमने मन में लोभ-लालच संजो रखे हैं, इसीलिए तुम्हें यह अनुभव नहीं हो रहा। अन्यथा वृंदावन की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति है।"

  11. श्री बिहारीदास मन सौं कहै - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (265)

    श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के अखंड नित्य विहार रस में ही अपने आप को सदा-सर्वदा स्थिर कर दे क्योंकि जो रस यहाँ प्राप्त होता है वैसा और कहीं नहीं है ।”

  12. पंडित या रस तें बचे- श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (322)

    विशुद्ध अनन्य प्रेम-रस की उपासना से पंडितजन ऐसे दूर भागते हैं, जैसे हरे-भरे खेत में “विझुका” (डरावना उपकरण) को देखकर मृग आदि भाग जाया करते हैं। इसका कारण यह है कि उनके माथे पर विधि-विधान, वेद-शास्त्रों का इतना भारी बोझ लदा रहता है कि वे प्रेम-भक्ति में दीन होकर नहीं उतर पाते। और जब तक कोई दीनातिदीन न बने, तब तक सच्ची प्रेम-भक्ति का आगमन भी अत्यंत कठिन है।

  13. अति टोंडिकु अति चिकनियाँ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (139)

    ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बिहारी) स्वरूप में उनके वैभव-ठकुराई की तो हवा भी नहीं है। यहाँ तो वे अति दीन होकर, श्री प्रिया जी (श्री राधा) के चरणों में पड़े रहते हैं एवं उनकी झूठन खाने को ही ललचाते रहते हैं।

  14. राख्यौ कहत न मैं कछू - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (220)

    सर्वोपरि नित्य बिहारिनी जू (श्री राधा) का महामधुर रसमय विहार ही हमारे जीवन के प्राणों का आहार (सर्वस्व) है। परमार्थ के सारों का सार यही विहार है, जिसे हमने तुमसे भली-भाँति कह दिया है, और इसमें कुछ भी छिपाया नहीं है।

  15. प्राण पालित पाइनि परें परसें होत निहाल - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (142)

    श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) की अद्भुत प्रेमासक्ति का वर्णन कैसे किया जाए? जिनके प्राणों का पालन एकमात्र श्री प्यारीजू (श्रीराधा) के चरणकमलों में सदा पड़े रहने से ही होता है । उन्हीं चरणों के सदा सपरस मिलने से वे सदा निहाल रहते हैं। नित्य विहार रस में सखियाँ इस प्रकार की विचित्र प्रेम-लीलायों से भरे हुए इन नव दूल्हा-दुल्हन को निरंतर लाड़ लड़ाती रहती हैं।

  16. नेष्ठा गर बंधन भये - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (374)

    यदि अन्य अन्य निष्ठाएँ ह्रदय में पड़ी हुई हैं, तो वह निष्ठाएँ ही गले का बंधन बन जाती हैं। जिनका मन आचार-विचार में फँसा हुआ है, जो नख से सिख तक विधि-निषेध से भरे हुए हैं, उनसे तो नित्य विहार रस स्वतः ही दूर हो जाता है।

  17. मूँड मुंडायें कहा भयो, जो मन न मुंडायौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (163)

    यदि मन की वासनाओं को नहीं मुड़ाया, तो केवल मूँड के मुड़ाने से कोई लाभ नहीं क्योंकि बिना सच्चे भाव के, मन में संतोष आ ही नहीं सकता ।

  18. एक दसा एकादसी एक इष्ट व्रत एक - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (640)

    श्री स्वामी हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में सदा काल एक ही इष्ट (श्री बिहारी बिहारिनी) की अनन्य उपासना है एवं एक ही दशा की एकादशी रहती है । अर्थात् इष्ट के प्रसाद का स्वरूप सदा ही एक सा रहता है, यहाँ ऐसा नहीं है कि सब दिन वो प्रसाद रहता है और एकादशी वाले दिन उसको अन्न समझकर त्याग दिया जाता है । अनन्य रसिक जन ऐसा नहीं करते ।

  19. नाम रूप विन गुन कहा - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (504)

    बिना गुण के परीक्षण किए, नाम तथा रूप एक समान हैं जिसका स्वरूप समझ में नहीं आ सकता है, जैसे केसर एवं कुसुम्भ के फूल कसे बिना एक समान ही दिखते हैं । (अर्थात् नाम एवं रूप की उपासना करते हुए गुणों का चिंतन तो अवश्य करना चाहिए)

  20. नांम न कछू बिहार बिनु - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (133)

    नित्य विहार रसमय उपासना में भाव से विहीन ख़ाली (केवल) नाम लेना तुम छोड़ दो क्योंकि भाव के बिना केवल नाम लेना ऐसे है जैसे बिना दूध की बांझ गैया । श्री युगल सरकार को नाम तभी सुहावना लगता है जब साधक नित्य विहार का अनुसंधान करके भाव से नाम लेता है ।