उतरार्द्ध [व्यास वाणी]

उतरार्द्ध, श्री व्यास वाणी का द्वितीय भाग है । रचयिता: श्री हरिराम व्यास

29 लेख उपलब्ध हैं

  1. गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)

    हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं।

  2. झूलत फूलत कुंजविहारी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (321)

    निकुंज में कुंजविहारी झूला झूल रहे हैं एवं प्रफुल्लित हो रहे हैं, और दूसरी ओर किशोरवल्लभा, वृषभानु की दुलारी, श्री राधा महारानी विराजमान हैं।

  3. आजु बधाई है बरसानैं - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (355)

    बरसाना आज बधाइयों से गूंज रहा है — वृषभानु जी के घर कुँवरि किशोरी श्री राधा का अवतरण हुआ है, और समस्त लोकों में मंगलध्वनि गूंज रही है।

  4. चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (326)

    आओ, चलें! वसंत का वृंदावन में आगमन हो गया है । खिलते हुए फूलों के गुच्छे लहरा रहे हैं, और मंद समीर उनकी मधुर सुगंध दूर-दूर तक बिखेर रही है।

  5. प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख

    श्री वृंदावन धाम के वृक्ष श्री हरि को अत्यंत प्यारे हैं । इन वृक्षों की शाखा तोड़ने से श्री हरि को कोटि गौ हत्या से भी अधिक कष्ट होता है ।

  6. ताके वल गर्वभरे रसिकव्यास से न डरे - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हीं श्री राधा के बल के गर्व में मैंने लोक, वेद, कर्म, धर्म एवं चारों प्रकार की मुक्ति का निर्भयता पूर्वक त्याग कर दिया है । [4]

  7. प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (10)

    वृंदावन के वृक्ष अत्यंत प्यारे हैं जिनको देखकर समस्त कामनाएँ विलीन हो जाती हैं क्योंकि इनके नीचे सदा श्री राधा मोहन विहार करते हैं ।

  8. नाँचत गोपाल वनैं नटवर वपु काछैं - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (167)

    श्रीकृष्ण कमर में काछिनी बांध कर नटवर का रूप धारण कर नृत्य कर रहे हैं। वह गान कर रहे हैं और श्री राधा के पीछे उनकी तेज गति से मेल खाते हुए नृत्य कर रहे हैं।

  9. पाछैं बैठे मोहन मृगनैंनींकी बैंनी गुहत - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (44)

    श्री कृष्ण श्री राधा के पीछे बैठकर उनकी वेणी गूँथ रहे हैं, इस छवि की शोभा कहते नहीं बनती, जिसे देख मेरी ऑंखें शीतल हो रही हैं।

  10. सरद सुहाई जामिनि, भामिनि रास रच्यौ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (234)

    शरद कि सुहावनी रात्रि में भामिनी श्री राधा ने रास रचा है । यमुना तट पर वंशीवट के निकट प्रवाहमान शीतल-मंद-सुगंधित पवन सुखमय है ।

  11. राधिका सम नागरी नवीन को प्रवीन सखी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

    हे सखी, श्री राधा के समान निपुण, नविन एवं प्रवीण कौन है? इनके रूप, गुण, सुहाग और भाग्य की समानता तीनों लोकों की कोई भी नारी नहीं कर सकती।

  12. आजु कछु कुंजनिमें वरषासी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (292)

    सखी भावयुक्त श्री हरिराम व्यास अन्य सखी से कहते हैं "हे सखी, आज कुञ्ज में हल्की वर्षा हो रही है । उन बादलों के भीतर बिजली की चपल तरंगों को तो देख ।"

  13. ललनकी बतियाँ चोज सनी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (122)

    श्री लालजी [कृष्ण] श्री राधा से प्रेम भरी बतियाँ कर रहे हैं । परम कृपालु श्री राधिका, करुणामयी दृष्टि से लाल जी की ओर निहार रही हैं ।

  14. नैंन सिरानैंरी प्यारी देखत मुख - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (122)

    हे प्यारी जू, आपके मुख कमल का दर्शन कर मेरे नेत्र अश्रुपूरित हो गए । हे श्री राधा, मेरी बात सुनिए, मुझपर आपकी करुणा दृष्टि होने से अब मेरी समस्त बाधाएं नष्ट हो गयी है ।

  15. मान न कीजै मानिनि वरषा ऋतु आई - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (188)

    श्री हरिराम व्यास श्री राधारानी से कहते हैं "हे मानिनी श्री राधा, देखिये वर्षा ऋतू आ गयी है, अब मान का त्याग कीजिये। श्री श्यामसुंदर के अंग से अंग मिलाकर राग मलार में हे श्री राधिका, गान कीजिये, जिसकी शोभा अवर्णनीय होगी।" [1]

  16. प्यारी तेरे वदन-कमल-रस अटक्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (53)

    हे प्यारी [राधे], लाल [कृष्ण] अलि [भँवरा] तुम्हारे बदन रूपी कमल रस पर अटक गया है । उनका तन आपके तन से मिला है, और मन आपके मन से मिला हुआ है, अब ऐसा उलझ गया है कि अकेला चल भी नहीं सकता ।

  17. रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123)

    हे राधा प्यारी, आपके इस अद्भुत रूप का वर्णन करने का सामर्थ मेरे में नहीं है । यदि मेरे रोम रोम में कोटि कोटि रसना भी हो तो भी मैं आपके गुणों का बखान नहीं कर सकता ।

  18. सुभग सुहाग को चिनौं प्यारी तेरे चरननि सोहै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (81)

    सखी भाव में अवस्थित श्री हरिराम व्यास श्री राधा से कहते हैं "हे प्यारी जू, परम सुभग श्री श्यामसुंदर के सुहाग चिन्ह तो आपके चरणों में शोभायमान है, एवं श्री वृन्दावन में इन्हीं चरण कमलों के चिन्ह श्री कृष्ण के मन को मोह लेते हैं।"