वल्लभ साखी

वल्लभ साखी, गोस्वामी श्री हरिराय जी द्वारा रचित, सौ भक्ति के दोहों (श्लोकों) का संग्रह है।

19 लेख उपलब्ध हैं

  1. रंचक दोष ना देखिये - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (31)

    प्रभु के विशुद्ध प्रेमी रसिक भक्त में भूलकर भी कभी रंचमात्र भी दोष-दर्शन नहीं करना चाहिए। उनके लौकिक अथवा बाह्य आचरण को न देखकर केवल उनके भीतर का वह अनमोल प्रेम-धन रूपी दिव्य गुण को ही निहारना चाहिए। इस संसार में सर्वप्रथम तो ऐसे प्रेमी संत का मिलना ही अत्यंत सुदुर्लभ है; किन्तु यदि भगवद्-कृपा और परम सौभाग्य से कभी कहीं वे मिल जायें, तो उनके सम्मुख अपने हृदय के समस्त कपाट (भाव) खोलकर स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए।

  2. मन नग ताको दीजिये जो प्रेम पारखी होय - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (29)

    अपने मन रूपी अनमोल रत्न को केवल उसी व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो प्रेम का सच्चा पारखी अर्थात् रसिक संत हो। यदि कोई प्रेम की गहराई और मूल्य को समझने वाला न मिले, तो मौन धारण कर लेना ही श्रेष्ठ है। व्यर्थ के लोगों के पीछे अपना अनमोल जीवन नष्ट करने से क्या लाभ?

  3. हरि जन आवे बारने हँसी हँसी नावे शीश - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (27)

    जब श्रीहरि के भक्त आपके द्वार पर पधारें, तब पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ, नतमस्तक होकर उनका वंदन करना चाहिए। उनके हृदय का आंतरिक भाव क्या है, यह तो वे ही जानें; किंतु हमारा भाव तो यही होना चाहिए कि स्वयं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक जगदीश्वर ही उनके रूप में साक्षात् पधारे हैं।

  4. श्री वृंदावन के वृक्ष को मरम न जाने कोय - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (73)

    श्री वृन्दावन के वृक्षों की ऐसी महिमा है जिसका मर्म कोई भी नहीं जानता। यहाँ के वृक्षों के केवल एक पत्ते का स्मरण कर लेने मात्र से ही जीव के भीतर दिव्य, चतुर्भुज समान सामर्थ्य प्रकट हो जाता है, क्योंकि यहाँ के प्रत्येक वृक्ष और पत्ते में साक्षात श्रीकृष्ण विराजमान हैं।

  5. पतितन में विख्यात हों - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (17)

    हे श्रीकृष्ण! मैं पतितों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हूँ — ‘महापतित’ ही मेरा नाम है। अब मैं आपसे याचक बनकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रत्येक क्षण मेरी शरणागति आपके श्रीचरणों में अटल बनी रहे।

  6. श्री वल्लभ वर को छांडि के भजे जो भैरव भूत - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (59)

    जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण को छोड़कर भैरव-भूत आदि की उपासना करता है, उसका अंत अत्यंत अपमानजनक होता है जैसे किसी गणिका (वेश्या) के बेटे को समाज आदर-सम्मान नहीं देता।

  7. जग में मिलन अनूप है भगवदियन को संग - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (26)

    इस संसार में सबसे अनुपम मिलन भगवत्प्रेमियों का संग है क्योंकि उनके संग के प्रभाव से मन सहजता से श्री कृष्ण के प्रेम-रंग में सराबोर हो जाता है।

  8. श्री यमुनाजी सो नेह करि यह नेमी तू लेह - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (76)

    यदि जीवन में कोई नियम अपनाना है, तो बस इतना कर — यमुना जी से अटूट प्रेम कर, और श्रीकृष्ण के दासों (भगवद्प्राप्त संतों) को छोड़ अन्य किसी से स्नेह न कर।

  9. श्री वृंदावन के दरस ते - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (71)

    श्री वृंदावन का दर्शन जीव के लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में अत्यंत अनुकूल और सहायक होता है। यह संसार एक अथाह समुद्र के समान है, जिसे पार करने का श्रेष्ठ साधन श्री वृंदावन ही है।

  10. देखी देह सुरंग यह मति भूले मन मांहि - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (38)

    हे मन! मोहक देह के सुंदर रूप को देखकर बहको मत। यह कभी न भूलो कि श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण) के अतिरिक्त इस संसार में कोई भी तुम्हारा सच्चा साथी नहीं है।

  11. उर बिच गोकुल नयन जल मुख श्री वल्लभ नाम - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (54)

    जो अपने हृदय में गोकुल बसाए रखते हैं, जिनकी आँखों में भक्ति के आँसू छलकते हैं, और जिनके मुख पर सदा श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण) नाम रहता है, ऐसे भक्त की समस्त मनोकामनाएं सहज ही पूर्ण हो जाती हैं।

  12. जागत सोवत स्वप्न में भोर द्योस निश सांझ - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (35)

    चाहे जाग्रत अवस्था हो, निद्रा हो या स्वप्न; चाहे प्रातःकाल, मध्यान्ह, संध्या या रात्रि का समय हो, सदा सर्वदा ब्रजेश्वर श्री कृष्णचंद्र के चरणकमलों को अपने हृदय में बसा कर रखो ।

  13. कोटि पाप छिन में टरे लेहि वृंदावन नाम - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (74)

    कोटि-कोटि पाप क्षणभर में मिट जाते हैं, जब कोई वृंदावन नाम का उच्चारण करता है। सुख की निधि “गोकुल गांव” का यश तीनों लोकों में गूंजता है।

  14. श्री वृंदावन बानिक बन्यो कुंज कुंज अली केली - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (72)

    श्री धाम वृंदावन की शोभा देखते ही बनती है, जहाँ प्रत्येक कुंज में दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण की केली लीलाओं का माधुर्य छलक रहा है। श्री राधा-कृष्ण ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो श्याम तमाल वृक्ष से कंचन बेली लिपटी हुई हो।

  15. रसिक जन बहु ना मिले सिंह यूथ नहिं होय - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (51)

    रसिक संत बहुत अधिक नहीं होते (अर्थात् वे अत्यंत दुर्लभ हैं), जैसे सिंह का कोई झुंड नहीं होता। विरह रूपी बेल सब जगह प्रकट नहीं होती, और न ही घट घट में प्रेम होता है।

  16. बहुत दिना भटकट फिर्यो - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (10)

    बहुत दिनों तक नाना प्रकार की साधनाओं में भटकता रहा, परंतु उससे कल्याण संभव नहीं हुआ। लेकिन जब से श्री कृष्ण का मन से स्मरण और भक्ति की, तभी से हृदय को शांति मिली और आध्यात्मिक जगत की शुद्ध वस्तु का बोध हो सका।

  17. प्रेम पारखी जो मिले ताको करि मनुहार - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (30)

    जब कोई प्रेम का पारखी, अनन्य रसिक संत मिले तो उनका प्रेम से आदर सत्कार करो, क्योंकि श्री प्रिया प्रियतम ऐसे प्रेमी महात्माओं की कृपा से मिलते हैं। इसलिए उन पर अपने समस्त सुखों को न्यौछावर कर देना चाहिए।

  18. कृष्ण प्रेम मातो रहे, धरे ना काहु शंक - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (56)

    श्री कृष्ण के प्रेम में मतवाला भक्त किसी का भय नहीं रखता। केवल तीन गांठों वाला साधारण कौपीन धारण करते हुए भी, वह स्वर्ग के सम्राट इंद्र को भी भिखारी समझता है।