वृन्दावन सत जो कहै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (105)
जो कोई इस वृन्दावन-शत-लीला को भावपूर्वक कहेगा अथवा सुनेगा, उसके हृदय में वृन्दावन का प्रकाश सदा झिलमिलाता रहेगा।
श्री ध्रुवदास द्वारा रचित वृंदावन और वृंदावन रस की महिमा के 100 दोहों की काव्य रचना एवं संग्रह ही वृन्दावन शत लीला है । लेखक: श्री हित ध्रुवदास
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जो कोई इस वृन्दावन-शत-लीला को भावपूर्वक कहेगा अथवा सुनेगा, उसके हृदय में वृन्दावन का प्रकाश सदा झिलमिलाता रहेगा।
मैंने तो अपने मन को कुछ आधार देने के लिए यह उपाय किया है, जिससे श्री वृन्दावन-रस का वर्णन करते हुए मन और बुद्धि कभी इसमें लग जाएँ।
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन-यशरूपी सौ रत्नों की माला गूंथकर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य-संयोग लिखा होगा, वही इसे धारण करेगा।
देह के सुख-स्वाद विस्मृत हो जाएँ, तन कुछ क्षीण हो जाए; परन्तु हृदय में प्रेम-रंग प्रवृद्धमान हो—ऐसी अवस्था में यमुना-तट पर विचरण करता रहे।
श्री श्यामा-श्याम के दिव्य अति-मधुर रूप की झलक नयनों में बनी रहे और उसी सुख के रंग में मन भी सदा रंगा रहे।
दूसरे-तीसरे दिन अनायास भाव से जो शाक-पत्रादि प्राप्त हो जाए, उसी में संतोष मानकर निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक वृन्दावन में रहे।
हृदय अत्यंत कोमलता से युक्त हो और सबसे कोमल चित्त से ही मिलें; व्यवहार में कभी भी कठोरता न लाएँ। जो सब प्रकार की इच्छाओं तथा राग-द्वेष से रहित है, उसका कहीं कोई शत्रु नहीं होता। इसी भाव से वृन्दावन में वास करें।
चौदह भुवन पर्यन्त सब नाशवान हैं; परंतु यह एक मात्र श्रीवृन्दावन धाम सहज-सुख-धाम है, अविनाशी है।
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं— श्री वृन्दावन की महिमा सुनकर जिनके हृदय में उत्साह और हर्ष उत्पन्न नहीं होता, उनका स्पर्श भी नहीं करना चाहिए; उनके संग का त्याग ही कर देना चाहिए।
संसार में प्रकट रूप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है और सुशोभित हो रहा है; फिर भी जीव उस रस-स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता—यह भी माया का ही रूप है।
यह मानव-देह एक अनमोल रत्न के समान है, जिसे प्राप्त करके भी तू अज्ञानवश व्यर्थ गँवा रहा है। यह तो वैसा ही है जैसे कोई अपने हाथों से ही अपनी बहुमूल्य संपत्ति को फेंक दे। वास्तव में, श्री कृष्ण की इस दुस्तर माया ने ही संपूर्ण जगत को अपनी मोहिनी शक्ति से भ्रमित कर रखा है।
वृन्दावन! अरे, आधा नाम ‘वृन्दा’ कहते ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और निर्मल चित्त में रस-भजन की प्रेम-लता अंकुरित हो जाती है।
हे जिह्वा! तू हर क्षण ‘वृन्दावन, वृन्दाविपिन, वृन्दाकानन’—इन परम सुखद, सुख-स्वरूप श्रीधाम के मधुर नामों को ही रट।
धरा-धाम पर विराजमान होते हुए भी श्रीवृन्दावन सर्वोपरि है, जिसकी वंदना स्वयं लक्ष्मीपति करते हैं; उसके समान और कौन हो सकता है?
जहाँ का वैभव देखकर स्वयं ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादिक भी बौरा (मोहित) जाते हैं, उस श्रीवृन्दावन की महिमा और वहाँ के रस की विभूति भला और कौन जान सकता है?
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्याग दूँगा, पर श्री वृन्दावन को कभी नहीं त्यागूँगा।
जहाँ चलते-फिरते “श्री राधावल्लभ लाल” का ही नाम सुनाई पड़ता है, ऐसे श्रीवृन्दावन में नित्य वास करना चाहिए।
वे माता-पिता, मित्र या पुत्र भी अपने नहीं हैं, जो वृंदावन-वास में व्यवधान डालते हैं।
हे मन! कहाँ विषय-वासना में रमा हुआ तू, और कहाँ परम सच्चिदानन्दघन वृंदावन। हित-कृपा से ऐसा सुंदर सुयोग प्राप्त हुआ है; अतः इस बात को भली-भाँति समझकर अपनी चतुराई छोड़ दे और वृंदावन का सेवन कर।
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे वृंदावन की शरण ली है, जहाँ चंचल मन यदि विषयों की ओर दौड़ने भी लगता है, तो भजन बीच में ही उसका हाथ पकड़कर उसे सँभाल लेता है, अर्थात् उसकी रक्षा कर लेता है।