वृन्दावन शत लीला

श्री ध्रुवदास द्वारा रचित वृंदावन और वृंदावन रस की महिमा के 100 दोहों की काव्य रचना एवं संग्रह ही वृन्दावन शत लीला है । लेखक: श्री हित ध्रुवदास

115 लेख उपलब्ध हैं

  1. या मन के अवलंब हित - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (114)

    मैंने तो अपने मन को कुछ आधार देने के लिए यह उपाय किया है, जिससे श्री वृन्दावन-रस का वर्णन करते हुए मन और बुद्धि कभी इसमें लग जाएँ।

  2. वृन्दावन सत रतन की - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (103)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन-यशरूपी सौ रत्नों की माला गूंथकर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य-संयोग लिखा होगा, वही इसे धारण करेगा।

  3. देह स्वाद छुटि जाहिं सब - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (90)

    देह के सुख-स्वाद विस्मृत हो जाएँ, तन कुछ क्षीण हो जाए; परन्तु हृदय में प्रेम-रंग प्रवृद्धमान हो—ऐसी अवस्था में यमुना-तट पर विचरण करता रहे।

  4. कोमल चित्त सब सौं मिलै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (88)

    हृदय अत्यंत कोमलता से युक्त हो और सबसे कोमल चित्त से ही मिलें; व्यवहार में कभी भी कठोरता न लाएँ। जो सब प्रकार की इच्छाओं तथा राग-द्वेष से रहित है, उसका कहीं कोई शत्रु नहीं होता। इसी भाव से वृन्दावन में वास करें।

  5. वन्दावन कौ जस सुनत - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (85)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं— श्री वृन्दावन की महिमा सुनकर जिनके हृदय में उत्साह और हर्ष उत्पन्न नहीं होता, उनका स्पर्श भी नहीं करना चाहिए; उनके संग का त्याग ही कर देना चाहिए।

  6. प्रगट जगत में जगमगै - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (83)

    संसार में प्रकट रूप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है और सुशोभित हो रहा है; फिर भी जीव उस रस-स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता—यह भी माया का ही रूप है।

  7. पाइ रतन चीन्हौं नहीं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (82)

    यह मानव-देह एक अनमोल रत्न के समान है, जिसे प्राप्त करके भी तू अज्ञानवश व्यर्थ गँवा रहा है। यह तो वैसा ही है जैसे कोई अपने हाथों से ही अपनी बहुमूल्य संपत्ति को फेंक दे। वास्तव में, श्री कृष्ण की इस दुस्तर माया ने ही संपूर्ण जगत को अपनी मोहिनी शक्ति से भ्रमित कर रखा है।

  8. वृन्दावन वृन्दा कहत - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (77)

    वृन्दावन! अरे, आधा नाम ‘वृन्दा’ कहते ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और निर्मल चित्त में रस-भजन की प्रेम-लता अंकुरित हो जाती है।

  9. सुरपति-पसुपति-प्रजापति - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (73)

    जहाँ का वैभव देखकर स्वयं ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादिक भी बौरा (मोहित) जाते हैं, उस श्रीवृन्दावन की महिमा और वहाँ के रस की विभूति भला और कौन जान सकता है?

  10. बसिके वृन्दाविपिन में - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (67)

    श्री वृन्दावन में वास करते हुए यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्याग दूँगा, पर श्री वृन्दावन को कभी नहीं त्यागूँगा।

  11. कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (62)

    हे मन! कहाँ विषय-वासना में रमा हुआ तू, और कहाँ परम सच्चिदानन्दघन वृंदावन। हित-कृपा से ऐसा सुंदर सुयोग प्राप्त हुआ है; अतः इस बात को भली-भाँति समझकर अपनी चतुराई छोड़ दे और वृंदावन का सेवन कर।

  12. यद्यपि धावत विषै कौं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (60)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे वृंदावन की शरण ली है, जहाँ चंचल मन यदि विषयों की ओर दौड़ने भी लगता है, तो भजन बीच में ही उसका हाथ पकड़कर उसे सँभाल लेता है, अर्थात् उसकी रक्षा कर लेता है।