श्री अलबेली अलि

श्री अलबेली अलि महात्मा श्री वंशी अलि जी के कृपा पात्र शिष्य थे।

50 लेख उपलब्ध हैं

  1. परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)

    जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।

  2. भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)

    हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक आपके नाम का उच्चारण करेगा? मेरे हृदय में ऐसी निष्कपट और अखण्ड प्रीति-दशा की प्राप्ति कब होगी?

  3. गुंजन मधुपन सुनत अलींरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (22)

    प्रभात बेला में जैसे ही सखियों के कानों में भौंरों की मधुर गुंजार पड़ी, वे आनंद-विभोर होकर महल की ओर बढ़ चलीं। उनकी चाल ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो प्रेम की नदी उफनकर रूप के अपार महासागर की ओर प्रवाहित हो रही हो।

  4. चकित नैन कंपत हियौ महा विरह की पीर - श्री अलबेली अलि

    श्री अलबेली अलि, श्री राधा के दर्शन की व्याकुलता में अपने विरह की दशा का वर्णन करती हैं— “नयन अचंभित हैं, हृदय और शरीर में निरंतर कंपन हो रहा है। अश्रुधारा ऐसे प्रवाहित हो रही है मानो कोई झरना फूट पड़ा हो और वे यमुना तट पर श्री किशोरी जी के चिंतन में बेसुध पड़ी हुई हैं ।”

  5. परमप्रेम गुन रूप अमित कवि को कहै - श्री अलबेली अलि

    हे श्री राधे! तुम्हारे अगाध प्रेम, गुणों और सौंदर्य (रूप) का वर्णन कौन कवि कर सकता है? एक दीन मछली पानी में रहती है, भला वो अगाध सागर का अंत कैसे पा सकती है?

  6. बड़े बड़े नयन अरुण रत्नारे - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (68)

    श्रीराधा के बड़े-बड़े नेत्र अरुण रत्नों जैसे लालिमायुक्त हैं। वे रस में ऐसे छके हुए है कि उनींदे-से प्रतीत होते हैं, मानो नींद उनकी पलकों के चारों ओर घूमती फिर रही हो।

  7. लटकत आावत बाहाँ जोरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (186)

    श्री राधा-कृष्ण बाँहों में बाँहें डालकर प्रेम से लहराती हुई चाल में आ रहे हैं । दोनों सुंदर प्रेमी (राधा और कृष्ण) खिलखिलाते हुए, एक-दूसरे का हाथ थामे, घने कुंजों में विचरण कर रहे हैं।

  8. ए दोउ राजत रंग भरे री - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (166)

    युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं।

  9. निरखि निरखि अलि रूप लुभानी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (59)

    जिस प्रकार भौंरे कमल पर मँडराते हैं, उसी प्रकार सहचरी के नेत्र श्री राधा की अलौकिक रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं। उसका रसपान करते हुए भी वे तृप्त नहीं होते अपितु और भी अधिक लालायित रहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप वे पलक झपकना भी भूल जाती हैं।

  10. पायन पायली जगमग जोति - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (109)

    श्री राधा के चरणकमलों में सुसज्जित पायल की ज्योति ऐसी जगमगा रही है मानो नवीन नौ रत्नों के दीपक अपनी दिव्य आभा बिखेर रहे हों जो बड़े, कंचन मोतियों में गुंथे हुए हैं।

  11. गहैं चरन कल ललन लुभावैं - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (108)

    श्री राधा के चरण कमलों के स्पर्श का सुख प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण सदा व्याकुल रहते हैं। श्री राधा के चरण कमल अरुणिम आभा से युक्त हैं और मेहँदी के रंग से अनुरंजित हैं, जिसमें श्री कृष्ण जावक लगते हैं और चित्र बनाते हैं।

  12. जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (170)

    हे प्यारी जू [श्री राधा], जहाँ-जहाँ आप अपने चरणों को रखेंगी, वहाँ-वहाँ मैं अपने नैनों के पाँवड़े बिछाऊँगी। जब-जब आप सघन कुंजों में विहरेंगी, वहाँ चुन-चुन कर मार्ग में फूलों को बिछाऊँगी।

  13. प्यारी तेरे बड़े बड़े नैन सलोने - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (168)

    हे प्यारी जू (श्री राधे)! तुम्हारे बड़े-बड़े नयन अति सलोने हैं, जो चंचल, चपल, अरुण, एवं अनियारे हैं, और जिनकी थोड़ी सी चितवनी ही टोना कर देती है।