अनन्यरसिकभरण ग्रंथ

अनन्यरसिकभरण ग्रंथ श्री भागवत रसिक देव जी की वाणी का पाँचवाँ अध्याय है। इस अध्याय को 12 झाँकियों [अध्यायों] में विभाजित किया गया है। रचयिता : श्री भागवत रसिक देव जी

59 लेख उपलब्ध हैं

  1. नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

    आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।

  2. रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (12)

    हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख कमल और उन्नत उरोज कमल — ये दस कमल, सदा सहज खिले रहते हैं।

  3. नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2)

    नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अनन्त उमंगों और हर्षोल्लास के साथ परस्पर होली-लीला में उन्मत्त हैं।

  4. दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (16)

    (नित्यविहार-रत श्यामाश्याम की परिचर्या में अवस्थित श्रीभगवतअलि जी कहती हैं कि नित्यविहार की स्थिति में अधीर हुए) प्रिया-प्रियतम मेरे कानों से लग-लगकर और अँकोर के रूप में चुंबन का प्रसाद दे-देकर कह रहे हैं कि "हे प्यारी सखी, मैं तुझ पर बलिहारी हूँ। तू जैसे भी हो, इस बार तो मुझे जिता ही दे !"

  5. पाँयन परि बिनती करै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.8)

    लालजी (श्रीकृष्ण) जब श्री प्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में पड़कर दैन्यपूर्वक विनय करते हैं, तो वही श्रृंगार रस का मुख्य स्वरूप है। प्रियतम की विनय-वाणी से द्रवीभूत होकर, मान का त्याग कर श्री किशोरीजी जब प्यारे के प्रति मृदु वचन बोलती हैं, तो वही करुण रस की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानी जाती है।

  6. बहु बिधि मर्दन करें - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.6.3)

    भगवतरसिक जी कहते हैं कि भले ही कोई कितनी ही दवाओं से और कितने ही प्रकार से मुर्दे की मालिश क्यों न करे, वह कभी जिन्दा नहीं हो सकता । इसी प्रकार रस का अनुभव न रखने वाले नीरस व्यक्ति को कितना ही समझाइये, कितना ही पढ़ाइये, वह रस की बात को समझ ही नहीं सकता।

  7. नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.1)

    अनंग-रंग में सराबोर श्रीयुगलकिशोर एकान्त में नाच रहे हैं | काम-केलि की नयी-नयी कलाओं में लगे हुए मन वाले उन दोनों के अंग-अंग से अनगिनत हाव-भाव उत्पन्न हो रहे हैं।

  8. नहिं हिंदू नहिं तुरक हम - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

    मैं न हिंदू हूँ, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी और न ही अंग्रेज। मैं तो प्रेम में उन्मत्त होकर (सहचरी स्वरूप से) नित्य श्री प्रिया प्रियतम की सुमन सेज संवारता रहता हूँ।

  9. नैना घूमत हैं मद छाके - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.1)

    (श्रीयुगल की सुरतान्त छवि का अंकन है।) प्रिया-प्रियतम जमुहाई लेते हुए जाग रहे हैं। उनके मद-भरे नयन चंचल हो रहे हैं। वस्त्र-अलंकार अस्त-व्यस्त हैं।

  10. आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (7.3)

    आज जो शोभामयी श्रीकिशोरी जी (श्री राधा) प्रेम रस में उन्मत्त होकर डोल (घूम) रही हैं । वे प्रियतम प्यारे के साथ दिव्य मदन के रंग में सराबोर हो रही हैं और उनके अंग अंग से आनंद की उमंगें ऐसे बरस रही हैं, जैसे (हाव भाव आदि) गुणों का खजाना ही खुल गया हो ।

  11. कामी कै प्रिय कामिनी लोभी कै प्रिय दाम - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (8.7.1)

    जैसे कामासक्त पुरुष को कामिनी अत्यंत प्रिय होती है और लोभी को धन अत्यंत प्रिय लगता है, उसी प्रकार रसिकों को श्री श्यामा-श्याम सहज भाव से प्रिय लगते हैं।

  12. निहं हिंदू नहिं तुरक हम, नहिं जैनी अंग्रेज - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

    हम न तो हिन्दू हैं, न ही मुसलमान (तुरक), न ही हम जैन हैं और न ही अंग्रेज। हमारी (सखियों) की तो बस एक ही पहचान और सेवा है—हम तो रसिक अनन्य भाव से नित्य-निरंतर निकुंज-भवन में अपने प्रिया-प्रियतम की पुष्प-शैय्या के पुष्पों को संवारने और उनकी सेवा में ही तल्लीन रहते हैं।

  13. सुरत सरोवर, समर जल, उठत कटाच्छ तरंग - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (15)

    इस नित्य-विहार के सरोवर में विशुद्ध प्रेममयी केलि का रस भरा है। इसमें कटाक्षों की तरंगें उठ रही हैं और अद्भुत रंग के अठारह कमल खिले हुए हैं। किशोरीजी के श्री-अंगों के दस कमल (दो हस्त, दो चरण, दो नयन, दो उरोज, एक नाभि और एक मुख) और लालजी के श्री-अंगों के आठ कमल (दो हस्त, दो चरण, दो नयन, एक नाभि और एक मुख) मिलकर अठारह कमल हो गए हैं।

  14. बेगम अगम निगम कहैं - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 7 (7)

    वेद जिस परम तत्व को अगम और दुर्लभ बताते हैं, वही तत्व श्री लाड़िली लाल की दिव्य जोड़ी के रूप में रसिकों को सहज सुलभ है। इतना ही नहीं, रसिक जन ऐसे दलाल के समान हैं, जो अन्य जनों को भी इस प्रेम-जोड़ी की प्राप्ति करा सकते हैं।

  15. कोक कला संगीत लाल कौं - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.2)

    ये किशोरी जी [श्री राधा] लाल जी [श्री कृष्ण] को बड़ी रस भरी रीति से प्रेम शास्त्र का गीत संगीत सिखाया करती हैं ।

  16. समन - सेज, पौढे, दोऊ, परिरंभन सुख लेत - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (17)

    सुमन-सेज, अर्थात् पुष्प-शैया पर विराजे श्री युगल इस समय आलिंगन-सुख का आस्वादन कर रहे हैं। इस परम सुखमय लीला-समायोजन की परिचर्या पर प्रसन्न होकर वे नित्य ही सखी श्री भगवत-अलि को बार-बार चुंबन-प्रसाद प्रदान कर रहे हैं।

  17. पौढे ललित लतानि तरै - श्री भगवत रसिक, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.4)

    सुख राशि श्रीप्रिया प्रियतम सुंदर लताओं के नीचे सुमनों की सेज पर लेटे हैं। इस प्रेमी युगल के अधर अधरों से और उरोज उरोजों से सटे हैं, कटि से कटि जुड़ी है और दोनों ने लिपटकर एक दूसरे को भुजाओं में भर रखा है। इस प्रकार आनंदोन्मत्त प्रिया प्रियतम इस अद्भुत रस में निमग्न मन होकर सो रहे हैं और भगवत अलिजी उनका पंखा झल रही हैं ।

  18. जमुना जल विमलत जुगल किशोर - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (4)

    युगलकिशोर श्रीश्यामा-कुंजविहारी (अपने केलि-विलास-द्वारा) श्रीयमुनाजी के जल को निर्मल बना रहे हैं। पहले इन प्रियालाल ने उबटन करके यमुना-जल में स्नान किया है, फिर वस्त्राभूषण धारण करके ऐसे सज गये हैं, जैसे एक ही श्रृंगार रस दोनों ओर (दो रूपों में) सज्जित हो गया हो।

  19. वन्दत प्रिया पाद जल जात - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 7 (6)

    अपनी प्राणप्रिया श्री राधा के चरणकमलों की वन्दना करते हुए श्री श्यामसुन्दर कामरस के वशीभूत होकर इन चरणकमलों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हैं।