छूटक पद [श्री नागरी दास जी की वाणी]

छूटक पद श्री नागरीदास जी की वाणी का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें ब्रज धाम एवं श्यामा श्याम के दिव्य लीलाओं के विविध पदों का मिश्रण हैं। रचयिता: श्री नागरीदास जी

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  1. अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)

    हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है।

  2. देह धरे को अब फल पायो - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (121)

    अब मैंने इस मानव देह धारण करने का असली फल पाया है। बहुत समय तक इस सांसारिक जाल के उलझनों में फँसा रहा और माया मुझे नाच नचाती रही ।

  3. हमारी बाँह गही वृन्दावन - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (119)

    वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है।

  4. करिये ब्रज बासिन सौं नेह - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (3)

    ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता।

  5. साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (110)

    जो अनन्य रसिक होता है वह प्रिया प्रियतम के नित्य विहार को ही निरखता है एवं दिव्य दंपति की उसी प्रेम लीला को ही नित्य सुनता और सुनाता है ।

  6. अब तो कृपा करो व्रजवासी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (98)

    हे ब्रज वासी जन, अब मुझपर कृपा कीजिए । आप सब तो जुगों जुगों से श्री श्यामसुंदर के सखा हो और उनकी लीला की उपासी हो ।

  7. घर घर टहल करत है लक्ष्मी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (133)

    ब्रज में स्वयं लक्ष्मीजी एक घर से दूसरे घर विचरण करती रहती हैं और कभी भी ब्रज से दूर नहीं जातीं। ब्रज-वृन्दावन की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ मुक्ति भी सदा हाथ जोड़कर खड़ी रहती है।

  8. अब तो कृपा करो सब संत - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (99)

    श्री नागरीदास जी समस्त संतों से प्रार्थना कर रहे हैं की "हे समस्त संत जनों, इस शरीर और मन में अहम् बुद्धि के भ्रम से भटकते हुए अनंत जीवन बीत गए, अब तो कृपा कीजिये।"

  9. इतनी है सब ठौर हमारी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (106)

    हमारी ठौर [निवास स्थल] इतनी ही है: वृंदावन, यमुना, गोवर्धन, राधाकुंड इत्यादि जो हृदय को सुख देने वाली है ।

  10. व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (146)

    ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात ब्रज रस ही रसिकों ने गाया है, यदि आप ब्रज को हटा (नज़र अंदाज़) देंगे तो आपका सारा रस ही मर (खत्म) जाएगा। ब्रज महिमा को केवल वही जानता है जिसका ब्रज से नाता है।

  11. मोहन कृपा कटाक्ष निहारैंगे - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), छूटक पद (140)

    श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंगे ।

  12. हम तो वृन्दावन रस अटके - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (118)

    श्री नागरीदास कह रहे हैं "मैं तो श्री वृन्दावन रस में डूब चुका हूँ। जब तक इस रस का परिचय नहीं हुआ तब तक संसार में बहुत भटकता रहा।