छूटक पद [श्री नागरी दास जी की वाणी]
छूटक पद श्री नागरीदास जी की वाणी का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें ब्रज धाम एवं श्यामा श्याम के दिव्य लीलाओं के विविध पदों का मिश्रण हैं।
रचयिता: श्री नागरीदास जी
31 लेख उपलब्ध हैं
हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)
हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।
भक्ति बिन हैं सब लोग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)
भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निष्फल है। ऐसे लोग आपस में निरन्तर लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जैसे जंगली घोड़े एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं।
अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)
हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है।
देह धरे को अब फल पायो - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (121)
अब मैंने इस मानव देह धारण करने का असली फल पाया है। बहुत समय तक इस सांसारिक जाल के उलझनों में फँसा रहा और माया मुझे नाच नचाती रही ।
ब्रज के परम सनेही लोग - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (2)
ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं।
ये ब्रजबासी हरि के प्यारे - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (125)
ये ब्रजवासी श्री हरि के प्यारे हैं। वे हरि में हैं, और हरि उनमें सदा रहते हैं, एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते।
हमारी बाँह गही वृन्दावन - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (119)
वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है।
करिये ब्रज बासिन सौं नेह - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (3)
ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता।
हम तो बरसाने के बासी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (107)
हम श्री बरसाना धाम के वासी हैं कहाँ सुंदर गह्वर वन है, ब्रह्म पर्वत है, साँकरी खोर आदि हैं, जहां की ठौर सुंदर एवं रस बरसाने वाली है ।
बहुरि परे वा दिश को पांव - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (102)
अब ऐसा कब होगा जब मेरे चरण वृंदावन की ओर चलेंगें । जहां परम मनोहर यमुना का तट है, उसी दिशा में ही मेरा गाँव है ।
साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (110)
जो अनन्य रसिक होता है वह प्रिया प्रियतम के नित्य विहार को ही निरखता है एवं दिव्य दंपति की उसी प्रेम लीला को ही नित्य सुनता और सुनाता है ।
अब तो यही बात मनमानी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (74)
अब यही बात मन को भाती है कि श्यामा श्याम की रजधानी श्री वृंदावन धाम का एक क्षण के लिए भी त्याग नहीं करना ।
जो सुख लेत सदा व्रजवासी - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (144)
जो दिव्य सुख ब्रजवासी सदा प्राप्त करते हैं वह सुख साक्षात वैकुंठ निवासी सपने में भी प्राप्त नहीं कर सकता ।
अब तो कृपा करो व्रजवासी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (98)
हे ब्रज वासी जन, अब मुझपर कृपा कीजिए । आप सब तो जुगों जुगों से श्री श्यामसुंदर के सखा हो और उनकी लीला की उपासी हो ।
घर घर टहल करत है लक्ष्मी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, छूटक पद (133)
ब्रज में स्वयं लक्ष्मीजी एक घर से दूसरे घर विचरण करती रहती हैं और कभी भी ब्रज से दूर नहीं जातीं। ब्रज-वृन्दावन की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ मुक्ति भी सदा हाथ जोड़कर खड़ी रहती है।
अब तो कृपा करो सब संत - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (99)
श्री नागरीदास जी समस्त संतों से प्रार्थना कर रहे हैं की "हे समस्त संत जनों, इस शरीर और मन में अहम् बुद्धि के भ्रम से भटकते हुए अनंत जीवन बीत गए, अब तो कृपा कीजिये।"
इतनी है सब ठौर हमारी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (106)
हमारी ठौर [निवास स्थल] इतनी ही है: वृंदावन, यमुना, गोवर्धन, राधाकुंड इत्यादि जो हृदय को सुख देने वाली है ।
व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (146)
ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात ब्रज रस ही रसिकों ने गाया है, यदि आप ब्रज को हटा (नज़र अंदाज़) देंगे तो आपका सारा रस ही मर (खत्म) जाएगा। ब्रज महिमा को केवल वही जानता है जिसका ब्रज से नाता है।
अब तो करिये कृपा विहारी - श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (95)
हे बिहारी जी, अब तो आप हमपर कृपा कीजिए। जग जंजाल से हमें निकल कर आप हमें वहाँ बसाइए जहां आपकी कुंज (वृंदावन) है ।
मोहन कृपा कटाक्ष निहारैंगे - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), छूटक पद (140)
श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंगे ।