भक्ति बिन हैं सब लोग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)
भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निष्फल है। ऐसे लोग आपस में निरन्तर लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जैसे जंगली घोड़े एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं।
छूटक पद श्री नागरीदास जी की वाणी का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें ब्रज धाम एवं श्यामा श्याम के दिव्य लीलाओं के विविध पदों का मिश्रण हैं। रचयिता: श्री नागरीदास जी
30 लेख उपलब्ध हैं
भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निष्फल है। ऐसे लोग आपस में निरन्तर लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जैसे जंगली घोड़े एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं।
हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है।
अब मैंने इस मानव देह धारण करने का असली फल पाया है। बहुत समय तक इस सांसारिक जाल के उलझनों में फँसा रहा और माया मुझे नाच नचाती रही ।
ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं।
ये ब्रजवासी श्री हरि के प्यारे हैं। वे हरि में हैं, और हरि उनमें सदा रहते हैं, एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते।
वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है।
ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता।
हम श्री बरसाना धाम के वासी हैं कहाँ सुंदर गह्वर वन है, ब्रह्म पर्वत है, साँकरी खोर आदि हैं, जहां की ठौर सुंदर एवं रस बरसाने वाली है ।
अब ऐसा कब होगा जब मेरे चरण वृंदावन की ओर चलेंगें । जहां परम मनोहर यमुना का तट है, उसी दिशा में ही मेरा गाँव है ।
जो अनन्य रसिक होता है वह प्रिया प्रियतम के नित्य विहार को ही निरखता है एवं दिव्य दंपति की उसी प्रेम लीला को ही नित्य सुनता और सुनाता है ।
अब यही बात मन को भाती है कि श्यामा श्याम की रजधानी श्री वृंदावन धाम का एक क्षण के लिए भी त्याग नहीं करना ।
जो दिव्य सुख ब्रजवासी सदा प्राप्त करते हैं वह सुख साक्षात वैकुंठ निवासी सपने में भी प्राप्त नहीं कर सकता ।
हे ब्रज वासी जन, अब मुझपर कृपा कीजिए । आप सब तो जुगों जुगों से श्री श्यामसुंदर के सखा हो और उनकी लीला की उपासी हो ।
ब्रज में स्वयं लक्ष्मीजी एक घर से दूसरे घर विचरण करती रहती हैं और कभी भी ब्रज से दूर नहीं जातीं। ब्रज-वृन्दावन की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ मुक्ति भी सदा हाथ जोड़कर खड़ी रहती है।
श्री नागरीदास जी समस्त संतों से प्रार्थना कर रहे हैं की "हे समस्त संत जनों, इस शरीर और मन में अहम् बुद्धि के भ्रम से भटकते हुए अनंत जीवन बीत गए, अब तो कृपा कीजिये।"
हमारी ठौर [निवास स्थल] इतनी ही है: वृंदावन, यमुना, गोवर्धन, राधाकुंड इत्यादि जो हृदय को सुख देने वाली है ।
ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात ब्रज रस ही रसिकों ने गाया है, यदि आप ब्रज को हटा (नज़र अंदाज़) देंगे तो आपका सारा रस ही मर (खत्म) जाएगा। ब्रज महिमा को केवल वही जानता है जिसका ब्रज से नाता है।
हे बिहारी जी, अब तो आप हमपर कृपा कीजिए। जग जंजाल से हमें निकल कर आप हमें वहाँ बसाइए जहां आपकी कुंज (वृंदावन) है ।
श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंगे ।
हमारी अब सब बात बन गयी है। हमें अब कुंज महल की नित्य ही टहल मिल गयी है जहां नित्य ही नई नई रंगरली मनायी जाती है ।