श्री हठी जी के कवित्त
वृंदावन के रसिक श्री हठी जी द्वारा लिखित भक्ति सम्बंधित कवित्त।
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बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (18)
प्रेम-रंग से सराबोर, रंगीली श्री राधा रंगमहल-रूपी दिव्य मंडप में अद्भुत शोभा के साथ विराजमान हैं। ऐसी परम सिरताज महारानी की अनुपम सुंदरता का वर्णन शब्दों की सीमा में कैसे समा सकता है।
कोऊ छत्र लीनै कोऊ छाहगीर कीनै कोऊ - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (23)
कोई छत्र लेकर खड़ी है, कोई दर्पण लेकर खड़ी है, कोई वीणा लेकर मधुर संगीत गा रही है।
जात रूप तखत पै बैठी रूप रासि राधे - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (25)
रूप-सौंदर्य की अनंत राशि श्री राधा महारानी जब स्वर्ण-सिंहासन पर विराजती हैं, तो उनके अंगों की प्रभा स्वयं सूर्य के तेज को भी लज्जित कर देती है।
कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी राधा - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (99)
वृषभानु दुलारी श्री राधा अपनी सखियों के साथ सहज भाव से निकुंज के मार्ग की ओर चली जा रही हैं।
गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)
पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधारों के अधीन है।
जाके अंग अंग की बनक पै कनक वारै - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (41)
जिनके प्रत्येक अंग की बनक पर कनक (सोना) भी फीका लगता है, जिनके मोतियों के हार की शोभा को देख कामदेव भी मोहित हो जाता है।
चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (48)
चन्द्र के समान, नवल सखियों के संग सुसज्जित श्री राधिका की छवि अद्वितीय है। स्वर्ग की अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, पार्वती देवी एवं अन्य ऐसी कौन सी देवी है जिसकी उपमा श्री राधा से की जाए (अर्थात् उनके समक्ष सबकी छवि फीकी दिखती है)।
चामीकर चौकी पर चंपक - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (21)
स्वर्ण (सोने) के आसन पर चंपक वर्णा श्री किशोरी जी विराजमान हैं, जिनके अंगों की उज्जवल कांति से संपूर्ण निकुंज सुसज्जित है।
जब तैं विलोक्यौ तोहि सुन्दर कुँवर कान्ह - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (54)
हे राधिका ! जब से श्री श्याम सुंदर ने तुम्हें निहारा है, तब से उनका चित्त पतंग के समान आसमान में उड़ रहा है।
अतर पुतायौ मढ्यौ महल सुगन्धन सौं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (8)
निकुंज महल को इत्र से सुवासित किया गया है, द्वार पर गजमोती के तोरण लगे हुए हैं।
कंजन - महल - चौक, चाँदनी बिछौना तामे - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (15)
श्री राधा के महल में सुंदर कमल के पुष्पों से युक्त प्रांगण है, जिसमें चाँदनी का बिछौना है तथा ज़री (सोने रंग) का मंडप बना है, जिसकी भव्यता सूर्य की ज्योति को भी मंद करने वाली है।
जन दुःखहरनी धरैनी यति ध्यावें तोहि - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (51)
हे जीवों के दुःख हरने वाली, सब संतगण आपका ही ध्यान करते हैं, आपकी लीलाओं एवं महिमा का वर्णन ब्रह्मा जी ने भी किया है।
गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (101)
हे श्री कृष्ण, यदि आप मुझे शिला बनाना चाहें तो गोवर्धन की शिला बनाना, मयूर बनाना हो तो आपके कुञ्ज का मयूर बनाना, और यदि पशु बनाना तो महाराज नन्द के महल का ही कोई पशु बनाना।
आजु हौं गई ही बीर सहज निकुञ्जन में - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (78)
श्री हठी जी एक सखी से कहतीं हैं "अरे सखी, मेरी बात सुन, मैं आज सहज ही निकुंज में चली गयी, वहाँ सब सुख प्रदान करनेवाले श्री श्यामाश्याम का विचित्र कौतुक देखा।"
आलसी हौं क्रूर हौं कपूत भांति भांतिन को - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (93)
श्री हठी जी कहते हैं "मैं आलसी हूँ, क्रूर हूँ, अनेक भाँति कपूत हूँ, लेकिन श्री कृष्ण की कृपा के अतिरिक्त मेरे पापों का कोई निवारण नहीं है।"
संभु सुर ध्यावैं सदा सेस गुन गावै विधि - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (55)
भगवान शिव एवं समस्त देवता श्री राधारानी का सदैव ध्यान करते हैं, शेषनाग गुणों का गान करते हैं तथा जिनके मुख से वेद प्रकट हुए हैं वे ब्रह्मा जी भी प्रयत्न करने पर भी श्री राधारानी का पार न पा सके।
गाय उठीं किंनरी नरीन ये सुरन सबै - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (39)
आज श्री राधारानी के प्राकट्य उत्सव पर सभी देवता, देवियाँ, किन्नर आदि आनंदित होकर गायन कर रहे हैं, और नगर-नगर, द्वार-द्वार नगाड़ों की गूंज सुनाई दे रही है।
जाकौं नेति नेति कहि वेदन बखानै भेद - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (56)
जिसे वेद "नेति नेति" कहकर वर्णन करते हैं, जिसे स्वयं श्री नारद जी भी पूरी तरह नहीं जानते, और ऐसा कोई दावा नहीं कर सकता कि उसने उसका संपूर्ण रहस्य जान लिया है।
फटिकसिलान के महल महारानी बैठी - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (24)
स्फटिक की शिलाओं से निर्मित भव्य महल में श्री राधारानी विराजमान हैं। देवताओं की रानियाँ, जो श्री राधा रानी की दासता से अभिभूत हैं, हाथ जोड़े उनके समक्ष उपस्थित हो रही हैं, और उनके हृदय श्री राधा के दिव्य दर्शन से भावविभोर हैं।
कोऊ धन धाम, चाहे अबिराम कोऊ - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (7)
श्री हठी जी कहते हैं, "कुछ लोग धन की प्राप्ति की लालसा रखते हैं, कुछ राज्य के सुख की इच्छा करते हैं, कुछ प्रतिष्ठा पाने के इच्छुक होते हैं, और कुछ लाखों बार इन्द्र के समान वैभव प्राप्त करने के बाद भी अपनी इच्छाओं का दमन नहीं कर पाते।"