श्री हित कृष्ण चंद्र

श्री हित कृष्ण चंद्र, वृंदावन के एक रसिक संत और रसिक शिरोमणि श्री हित हरिवंश महाप्रभु के पुत्र थे ।

25 लेख उपलब्ध हैं

  1. राधे त्वद्दास्य पदवी सर्व - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (66)

    हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय में संजोए बैठी हूँ।

  2. प्रेमामृत रसानन्द मकरन्दौघ - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (29)

    हे स्वामिनि! हे प्रेमामृत के आनंदरस का मधुर रस बरसाने वाली श्री राधे! आप कब मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करेंगी?

  3. किं करोमि क्क गच्छामि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (43)

    हे राधे ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? और किसके चरणों में लुण्ठित होऊँ ? तुम्हीं कहो तुम्हारा वह दास्य-रसोत्सव मुझे किस प्रकार प्राप्त होगा ?

  4. वैकुण्ठादि पदं काम्यमपि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (44)

    हे वृन्दावन में विलास करने वाली श्री राधे! जहाँ जहाँ पर भी मैं आपका दर्शन नहीं करती, उन वैकुंठ आदि परम धाम (एवं उनकी कामना) भी मेरे लिए अत्यंत तुच्छ है ।

  5. मुदित लाल प्यारी चरण चित्र करे - श्री हित कृष्ण चंद्र

    आनंद में मग्न होकर प्रियतम श्री कृष्ण, प्यारीजू श्री राधा के चरणों का चित्रांकन कर रहे हैं।नील कमल के समान सुंदर हाथों से, वे स्वर्ण कमल सदृश श्री राधा के चरणों को सजा रहे हैं, और चित्रित करते-करते उनके नेत्र प्रेम से सराबोर हो उठते हैं।

  6. न त्वं वैकुंठ लोकेपि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (49)

    हे श्री राधे! न आप वैकुण्ठ लोक में हैं और न आपके रस दाता प्रियतम श्री कृष्ण ही । यदि आप कहीं हैं, तो केवल श्री वृंदावन में । अतएव मैंने भी उसी श्री वृंदावन का आश्रय ग्रहण किया है ।

  7. सर्वे धर्माममाधर्माः - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (39)

    हे राधे! जहां कहीं भी, यदि आपके श्री चरण कमलों की माधुरी वहाँ प्राप्त नहीं होती तो मेरे लिए वे सब धर्म अधर्म है, साधु असाधु हैं एवं साधुता असाधुता ही है ।

  8. कोटि कोटि जगद्भासि नखचन्द्र मणिच्छटे - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (5)

    अपने चरणों की नख चन्द्र मणि की छटा से कोटि कोटि भ्रमांडों को भी प्रकाशित करने वाली स्वामिनी! हे आश्चर्यमय रूप लावण्यमयी! मुझे एक बार तो दर्शन दीजिए ?

  9. सर्वज्ञोपि परेशोपि मुग्ध मुग्धोति - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (8)

    जो सर्वज्ञ और परेश (परम-प्रभु) होकर भी मुग्ध दशा में दीनवत् जिनकी चाटुकारी करते हैं, वही [कृष्ण-प्रिया श्रीराधिका] मेरी एक मात्र गति हैं।

  10. त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (25)

    हे स्वामिनि [राधे]! केवल आपके ही चरण-कमलों के रस में मेरी मति रमण करती रहती है, तब आपकी करुणा-दृष्टि से अभिसिञ्चित होने की मेरी आशा को आप पूर्ण न करेंगी क्या?

  11. सर्व मर्य्यादयातीत सर्वेशाधिक - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (68)

    हे वृन्दावनेश्वरी श्रीराधे ! आपका वैभव सर्वेश [श्रीकृष्ण] से भी अधिक है । आप समस्त मर्यादाओं से परे हैं [ अर्थात् लोक-वेद-मर्याएँ आपको छू तक नहीं पातीं अर्थात् आप सर्व-तंत्र-स्वतंत्र हैं। मर्यादाओं के बन्धन में नहीं हैं। ] आपके लिये [ हम जैसों को भी अपना श्रीचरण कैंकर्य प्रदान करना ] क्या असंभव है ? नहीं।

  12. अनाथं पतितं मूढं - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (63)

    हे श्रीवृन्दावनेश्वरि [श्री राधा] ! इस अनाथ, पतित और मूढ़ की ओर एक बार भी तो अपनी स्नेहमयी कृपावलोकन से देख दीजिये; क्योंकि इसने केवल आपके ही चरणाश्रित जीवन को धारण कर रखा है।

  13. त्वत्सेवा रीतिराश्चर्य लोकवेद-विलक्षणा - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (24)

    हे श्रीवृन्दावनाधीश्वरि [श्री राधे] ! आपके चरण-कमलों की सेवा रीति आश्चर्य्यमयी एवं लोक-वेद-विलक्षण है। वह केवल आपकी कृपा और सद्गुरु के संग से ही कभी प्राप्त हो सकती है । अन्य प्रकार से नहीं ।

  14. अस्तु वामास्तु वा राधे कोटि जन्मान्तरेऽपि मे - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (60)

    हे राधे ! आपके चरण-सरोरुह-दास्य की आवश्यकीय आशा ही मेरी एक मात्र आशा है, वह चाहे कोटि-कोटि जन्मों में पूरी हो या न भी हो।

  15. हा राधे स्वामिनि कदा किशोरी दिव्य रूपिणी - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (37)

    हा राधे ! हा स्वामिनि !! मैं कब दिव्य स्वरूपमयी, एक मात्र प्रेम-रस-मग्न किशोरी होकर आपकी किंकरी (दासी ) हो सकूँगी ?

  16. सर्वथा सार सारैक नखचन्द्र - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (61)

    मैं आपके चरण-कमलों की सेवाशा का त्याग कैसे कर सकती हूँ ? जबकि हे राधे! आपके चरण-नख-चन्द्र की सुधा का लव - लेशमात्र ही सम्पूर्ण सारों का एकमात्र सार है।