राधे त्वद्दास्य पदवी सर्व - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (66)
हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय में संजोए बैठी हूँ।
श्री हित कृष्ण चंद्र, वृंदावन के एक रसिक संत और रसिक शिरोमणि श्री हित हरिवंश महाप्रभु के पुत्र थे ।
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हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय में संजोए बैठी हूँ।
हे स्वामिनि! हे प्रेमामृत के आनंदरस का मधुर रस बरसाने वाली श्री राधे! आप कब मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करेंगी?
हे राधे ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? और किसके चरणों में लुण्ठित होऊँ ? तुम्हीं कहो तुम्हारा वह दास्य-रसोत्सव मुझे किस प्रकार प्राप्त होगा ?
हे वृन्दावन में विलास करने वाली श्री राधे! जहाँ जहाँ पर भी मैं आपका दर्शन नहीं करती, उन वैकुंठ आदि परम धाम (एवं उनकी कामना) भी मेरे लिए अत्यंत तुच्छ है ।
आनंद में मग्न होकर प्रियतम श्री कृष्ण, प्यारीजू श्री राधा के चरणों का चित्रांकन कर रहे हैं।नील कमल के समान सुंदर हाथों से, वे स्वर्ण कमल सदृश श्री राधा के चरणों को सजा रहे हैं, और चित्रित करते-करते उनके नेत्र प्रेम से सराबोर हो उठते हैं।
हे श्रीराधे! आपके चरण-कमल-पराग से पूर्णतया अनुरंजित रसमय श्रीवृन्दावन के प्रति मुझे अचला प्रीति प्रदान कीजिए।
चतुर सुन्दरी-बृन्द की श्रेष्ठ चूड़ामणि रूपा श्रीराधे स्वामिनि ! हे महारस-निधे ! मैं कब आपके चरणों का आराधन (सेवन) करूँगी ?
हे श्री राधे! न आप वैकुण्ठ लोक में हैं और न आपके रस दाता प्रियतम श्री कृष्ण ही । यदि आप कहीं हैं, तो केवल श्री वृंदावन में । अतएव मैंने भी उसी श्री वृंदावन का आश्रय ग्रहण किया है ।
हे राधे! जहां कहीं भी, यदि आपके श्री चरण कमलों की माधुरी वहाँ प्राप्त नहीं होती तो मेरे लिए वे सब धर्म अधर्म है, साधु असाधु हैं एवं साधुता असाधुता ही है ।
हे श्री राधा! मैं कब सुकुमाराङ्गी किशोरी गोप कन्या होकर आपके मृदुल पद-कमलों का लालन- सम्वाहन करूँगी ?
अपने चरणों की नख चन्द्र मणि की छटा से कोटि कोटि भ्रमांडों को भी प्रकाशित करने वाली स्वामिनी! हे आश्चर्यमय रूप लावण्यमयी! मुझे एक बार तो दर्शन दीजिए ?
जो सर्वज्ञ और परेश (परम-प्रभु) होकर भी मुग्ध दशा में दीनवत् जिनकी चाटुकारी करते हैं, वही [कृष्ण-प्रिया श्रीराधिका] मेरी एक मात्र गति हैं।
हे स्वामिनि [राधे] ! लौकिक एवं वैदिक मार्गों का परित्याग करके मैं केवल आपके श्रीचरण-कमलों की शरण आई हूँ !
हे स्वामिनि [राधे]! केवल आपके ही चरण-कमलों के रस में मेरी मति रमण करती रहती है, तब आपकी करुणा-दृष्टि से अभिसिञ्चित होने की मेरी आशा को आप पूर्ण न करेंगी क्या?
हे वृन्दावनेश्वरी श्रीराधे ! आपका वैभव सर्वेश [श्रीकृष्ण] से भी अधिक है । आप समस्त मर्यादाओं से परे हैं [ अर्थात् लोक-वेद-मर्याएँ आपको छू तक नहीं पातीं अर्थात् आप सर्व-तंत्र-स्वतंत्र हैं। मर्यादाओं के बन्धन में नहीं हैं। ] आपके लिये [ हम जैसों को भी अपना श्रीचरण कैंकर्य प्रदान करना ] क्या असंभव है ? नहीं।
हे श्रीवृन्दावनेश्वरि [श्री राधा] ! इस अनाथ, पतित और मूढ़ की ओर एक बार भी तो अपनी स्नेहमयी कृपावलोकन से देख दीजिये; क्योंकि इसने केवल आपके ही चरणाश्रित जीवन को धारण कर रखा है।
हे श्रीवृन्दावनाधीश्वरि [श्री राधे] ! आपके चरण-कमलों की सेवा रीति आश्चर्य्यमयी एवं लोक-वेद-विलक्षण है। वह केवल आपकी कृपा और सद्गुरु के संग से ही कभी प्राप्त हो सकती है । अन्य प्रकार से नहीं ।
हे राधे ! आपके चरण-सरोरुह-दास्य की आवश्यकीय आशा ही मेरी एक मात्र आशा है, वह चाहे कोटि-कोटि जन्मों में पूरी हो या न भी हो।
हा राधे ! हा स्वामिनि !! मैं कब दिव्य स्वरूपमयी, एक मात्र प्रेम-रस-मग्न किशोरी होकर आपकी किंकरी (दासी ) हो सकूँगी ?
मैं आपके चरण-कमलों की सेवाशा का त्याग कैसे कर सकती हूँ ? जबकि हे राधे! आपके चरण-नख-चन्द्र की सुधा का लव - लेशमात्र ही सम्पूर्ण सारों का एकमात्र सार है।