तैं भाजन कृत जटित विमल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7)
जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्थात इस दुर्लभ मनुष्य देह से असत्य विषय सुख प्राप्त करना चाहे, तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ?
