हित स्फुट वाणी

श्री वृंदावन धाम के रसिक संत श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा विभिन्न पदों एवं दोहों का मिश्रण है।

36 लेख उपलब्ध हैं

  1. तैं भाजन कृत जटित विमल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7)

    जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्थात इस दुर्लभ मनुष्य देह से असत्य विषय सुख प्राप्त करना चाहे, तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ?

  2. आरती मदन गोपाल की कीजियै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (18)

    मदनगोपाल की आरती करनी चाहिये। देवऋषि नारद, वेदव्यास एवं शुकदेवजी जब विश्वास पूर्वक इस बात को कहते हैं तब (मदनगोपाल की आरती करके) बिना श्रम के रससिन्धु का पान क्यों नहीं करते?

  3. तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (10)

    हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है ।

  4. लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (22)

    हे सखी, तू अपने नेत्रों से लाल की रूप माधुरी को तनिक देख तो सही । सुकुमारता की राशि श्रीश्यामसुन्दर की मुसकान कामदेव के मन को हरण करने वाली है । उनके नख से शिखा पर्यन्त विभिन्न अंग इतने अधिक सुन्दर हैं मानो उन्होंने उमँगकर सुन्दरता की सीमा का उल्लंघन कर दिया है ।

  5. मैं जु मोहन सुन्यौ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (13)

    मैंने मदनगोपाल के मोहक वेणुनाद को सुना है। इस अद्भुत नाद को सुनकर आकाश में स्थित मुनियानों (विमानों) में बैठी हुई देवताओं की स्त्रियाँ थकित हो गईं।

  6. तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (17)

    हे राधिका प्यारी, गोवर्धनलाल को सदा तुम्हारा ही ध्यान रहता है। (श्रीश्यामसुन्दर को यहाँ गोवर्धनधर लाल कहकर यह व्यंजित किया गया है कि यद्यपि वे संसार के रक्षण एवं पालन में प्रवृत्त रहते हैं तथापि उनका मन अनन्य भाव से तुम में ही आसक्त रहता है।) इन श्याम तमाल के साथ तुम स्वर्णलता के समान उलझकर वयों नहीं सुशोभित होती ?

  7. वृषभानु नंदिनी राजति हैं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (15)

    श्रीवृषभानुनन्दिनी सुशोभित हो रही हैं। सुरत के रंग-रस से भरी हुई ये भामिनी सम्पूर्ण स्त्रियों को अपनी शोभा से पराजित करके उल्लसित हो रही हैं।

  8. सारस सर बिछुरंत कौ जो पल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (6)

    सारस के आक्षेप को सुनकर चकई अपने मन में विचार करती है कि) सारस का शरीर यदि सरोवर के अन्तर को एक क्षण के लिए भी सहन कर ले और उसकी पत्नी लक्ष्मणा को यदि काम की अग्नि का कठिन अनुभव करना पड़े तभी ये पराई पीड़ा को जान सकता है। इस स्थिति में कोई बज्र के समान कठोर शरीर वाला ही धैर्य धारण कर सकता है।

  9. भानु दसम्म, जनम्म निसापति - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (2)

    इस सवैये में सम्पूर्ण शुभ माने जाने वाले ग्रहों का उल्लेख करके भक्ति शून्य व्यक्ति के लिए उनकी व्यर्थता प्रतिपादित की गई है।

  10. द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (1)

    श्रीहित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि जन्मकुंडली में चाहे बारहवें चन्द्रमा, चौथे मंगल, विरुद्ध बुद्ध, वृहस्पति वक्री, दशवें शुक्र, केतु और शनि लग्न में, आठवें राहु और चौथे सूर्य पड़े हों तो भी शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि जब श्रीकृष्ण के चरणों में मन अर्पित हो चुका तब ये नवग्रह रंक क्या करेंगे?

  11. तू बालक नहिं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (4)

    तू बालक नहीं है और चतुरता से भरा हुआ है तो श्रीकृष्ण को भली प्रकार क्यों नही भजता? तू गाय के सुमधुर दूध को छोड़कर चावल के फीके पानी में अपने मन को बाँध रहा है!

  12. ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित - श्री हित स्फुट वाणी (3)

    यह नहीं जाना जा सकता कि क्षण के समाप्त होते होते कौन सी बुद्धि मन में प्रकाशित हो जायेगी। क्योंकि जो मुनिगण साधन करते-करते अचेतन जैसे बन गये वे भी अवसर आने पर विष व्याप्त हो गये (मोह ग्रसित हो गये)।

  13. आरति कीजै श्याम - सुन्दर की - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (19)

    भूमिकाः- यह आरती का पद है । श्रीहिताचार्य ने इस प्रकार की आरती के अवसर पर श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करने का विधान किया है जो साधु संग से प्रज्वलित की गई प्रेमाभक्तिमयी आरती के साथ स्वाभाविक ही है।

  14. हित हरिवंश डरौं काके डर

    श्रीहित हरिवंश जी कहते हैं अब मुझे किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मेरी बुद्धि कच्ची नहीं है अपितु भली भाँति परिपक्व, स्थिर और सुदृढ़ है।

  15. निकसि कुंज ठाडे भये - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.3)

    श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि प्रिया-प्रीतम निकुञ्ज से बाहर निकलकर खड़े हुए हैं, और दोनों ने परस्पर एक-दूसरे के कंधों पर अपनी भुजाएँ रखी हुई हैं। श्री हित हरिवंश जी अपने नेत्रों से श्री राधावल्लभ लाल के उस परम सुंदर मुख-कमल की छवि को एकटक निहार रहे हैं।