श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी)
श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) 18 वीं सदी के एक निम्बार्की संत थे, जिनका नाम महाराज सावंत सिंह था, जो कि जयपुर के राजा थे, लेकिन बाद में पूर्ण त्याग से ब्रज में अंत समय तक रहे।
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हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)
हमें शास्त्रों की कोई समझ नहीं है और न ही हम उन्हें समझना चाहते हैं। जो लोग इन्हें अब तक नहीं समझ पाए वे आगे भी नहीं समझेंगे, परंतु जिन महापुरुषों ने शास्त्रों के वास्तविक सार को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम केवल उसी का पालन करेंगे।
लेत न सुख हरि भक्ति - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
जो मनुष्य समस्त सुखों के वास्तविक सार भगवान की भक्ति के आनंद को ग्रहण नहीं करता, उसका इस संसार में राजा बन जाना भी व्यर्थ ही है; वह तो केवल संसार का बोझ उठाने वाले एक बेगार मजदूर की भाँति अपना जीवन गँवा रहा है।
भक्ति बिन हैं सब लोग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (132)
भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन निष्फल है। ऐसे लोग आपस में निरन्तर लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जैसे जंगली घोड़े एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं।
मोकौ लै एकान्त में मिलि - श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (06)
श्री नागरीदास कहते हैं कि उन्हें संसार की कोलाहलपूर्ण वृत्तियों से दूर, ब्रज के किसी गोपनीय एकान्त कुंज में ऐसे अनुभवी रसिक संतों का प्रेमपूर्वक संग कब प्राप्त होगा, जो श्री युगल सरकार की नित्य निकुञ्ज-लीलाओं का मधुर रसास्वादन करते हैं, तथा जिनके संग बैठकर नव-निकुञ्जों की गोपनीय एवं रसपूर्ण लीलाओं का श्रवण करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त होगा?
प्यारी के पाँइ लाल जावक दैन - श्री नागरीदास
श्री श्यामसुन्दर अपनी प्रिया जी (श्री राधा) के चरण-कमलों में बड़े अनुराग के साथ लाल महावर (जावक) लगा रहे हैं।
जाकों कहिये मूढ जग - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
जो जीव श्री यमुना जी के पावन तट और दिव्य श्री वृन्दावन धाम की अलौकिक रस-संपदा को त्यागकर, सांसारिक सुख-सुविधाओं की खोज में बीकानेर या अन्य स्थलों की ओर भागते हैं, वे ही वास्तविक मूर्ख हैं, मानो अनंत सुख का त्याग कर वे दुखों के दावानल के लिए भटक रहे हों।
रंगीली गलिन बिच हो हो होरी - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)
बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित विराजमान हैं।
ऐसौ बरसानों निरखि गहबर आयो प्रेम - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)
ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी दिव्य रज में लोटा, समस्त राजसी नियम स्वतः ही छूट गए।
अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)
हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है।
बहुत भूमि इत-उत फिरयौ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी
बहुत समय से मैं माया से मोहित होकर संसार में यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ। हाय! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे पाँव वास्तव में सफल होंगे — जब वे वृंदावन की ओर बढ़ेंगे और कभी वापस नहीं लौटेंगे।
ज्यौं ज्यौं इत देखियत - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (01)
एक बार श्री नागरीदास जी को किसी विशेष कारण से मरुस्थल जाना पड़ा। वहाँ की निर्जन भूमि में निवास करते हुए उनके हृदय में ब्रज की गहन स्मृति जाग उठी — जैसे-जैसे मेरी दृष्टि इन भगवद-विमुख, प्रेमहीन जीवों पर पड़ती है, वैसे-वैसे ब्रजवासियों की निश्छल भक्ति और माधुर्य की स्मृति तीव्रतर होती जाती है।
धेनु दुहत मोहन ठगे - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, दोहनानन्दाष्टक (4)
गाय का दूध दुहते समय, जैसे ही श्यामसुंदर की दृष्टि श्रीराधा के दिव्य रूप पर पड़ती है, वे ठगे से रह जाते हैं जिससे गाय के थन से दूध सीधे बर्तन में न गिरकर टेढ़ी-मेढ़ी धाराओं में बहने लगता है।
और जाकी वंशी सुनिबे कौं तरसत - श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (19)
जिस बांसुरी की ध्वनि को सारी सृष्टि सुनने को तरसती है, वे श्रीकृष्ण श्री राधा की बोली को सुनने के लिए व्याकुल रहते हैं।
देह धरे को अब फल पायो - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (121)
अब मैंने इस मानव देह धारण करने का असली फल पाया है। बहुत समय तक इस सांसारिक जाल के उलझनों में फँसा रहा और माया मुझे नाच नचाती रही ।
जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (30)
श्यामा-श्याम के अनुपम रूप-सौंदर्य में अटके हुए मन की दशा को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है, क्योंकि जीभ के पास वह मन नहीं है, और मन के पास वह जीभ नहीं है, जो अपनी अवस्था को प्रकट कर सके।
नागिरि नागर भाव तैं मंगल रूप रसाल - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (92.2)
दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण अद्भुत रस को बरसाने वाली परम मंगलकारी जोड़ी हैं। नित्य मंगलमयी भूमि श्रीधाम वृंदावन में, प्रेम और रस की दिव्य होली नित्य ही उत्सव के रूप में खेली जाती है।
ब्रह्मपुरी शिव जू की पुरी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (86)
ब्रह्मलोक, कैलाश और स्वर्गलोक — ये सब चाहे कितने भी महान क्यों न हों, परंतु मेरे हृदय में इनके लिए तनिक भी रुचि नहीं है।
ब्रज के परम सनेही लोग - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (2)
ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं।
तलहटी बरसाने की रहिये - श्री नागरीदास जी की वाणी
बरसाने की तलहटी (नीचे के हिस्से) में निवास करें। गहवर वन की लताओं में बैठकर राधा-राधा गान करें।
सहजै श्रीकृष्ण-कथा ठौर-ठौर - श्री नागरीदास जी की वाणी
जहां ठौर ठौर पर श्रीकृष्ण की कथाएँ सहजता से हो रही हैं, कीर्तन की मधुर ध्वनि हृदय में उल्लास लाती है।