प्रेम वाटिका

प्रेम वाटिका ग्रंथ श्री रसखान द्वारा रचित है जिसमें भक्ति प्रेम से सम्बंधित 53 दोहे का संकलन किया गया है।

42 लेख उपलब्ध हैं

  1. मित्र कलत्र सुबन्धु सुतइ नमें सहज सनेह - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (20)

    यद्यपि संसार में मित्र, पत्नी, भ्राता और पुत्र आदि संबंधों में स्वाभाविक अनुराग दृष्टिगोचर होता है, तथापि इसे 'विशुद्ध प्रेम' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। वास्तव में शुद्ध प्रेम की महिमा विलक्षण और वर्णनातीत है, जो निष्काम भाव से केवल प्रेमी को सुख देने के लिए ही किया जाता है।

  2. प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (26)

    जो प्रभु के प्रेम के बंधन में बँधकर मर जाता है, वही वास्तव में शाश्वत जीवन (अमरत्व) को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, प्रेम के इस गूढ़ रहस्य को जाने बिना, इस संसार में देह मात्र से जीवित रहने वाला व्यक्ति रसिकों की दृष्टि में मृत के समान है। ऐसा जीव मरने के बाद भी शाश्वत चिन्मय जीवन को प्राप्त नहीं कर पाता।

  3. स्वारथमूल असुद्ध त्यों सुद्ध स्वभाव अनुकूल - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (41)

    जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहा जाता है और जो निष्काम अथवा सहज भाव से केवल प्रियतम के सुख के लिए किया जाता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेम का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

  4. याही तें सब मुक्ति तें लही बड़ाई प्रेम - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (35)

    प्रेम में दो शरीरों को एक कर देने की शक्ति होती है, इसी कारण प्रेम का स्थान मुक्ति से भी ऊँचा माना गया है। जहाँ प्रेम प्रकट हो जाता है, वहाँ समस्त नियम और बंधन स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं अर्थात् प्रेम किसी भी नियम का पालन नहीं करता।

  5. डरै सदा चाहे न कछु सहै सबै हो होय - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (22)

    रसखान कहते हैं — जो इस भावना से डरता रहता है कि कहीं उसकी किसी चेष्टा से प्रियतम को कोई कष्ट न हो जाए, जो अपने प्रियतम से कोई भी कामना नहीं रखता, सब प्रकार की विपत्तियाँ सहकर भी जिसका प्रेम बढ़ता रहे, जो सदा एक प्रियतम के प्रेम-रस में डूबा रहता है — वही प्रेम, शुद्ध प्रेम कहलाता है।

  6. जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं जात्यौ जात बिसेष - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (18)

    जिसे जाने बिना और किसी का बोध नहीं होता, और जिसे जानने पर स्वयं दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् जिसका बोध हो जाने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता, वही सारों का सार तत्त्व प्रेम है।

  7. ज्ञान करम रु उपासना सब अहमिति को मूल - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (12)

    ज्ञान, कर्म-काण्ड, उपासना आदि यह सब मन में अहंकार उत्पन्न करते हैं। जब तक मनुष्य अपने को पूर्णतः प्रेममार्ग में नहीं समर्पित करता, उसके अनुकूल नहीं बनाता, तब तक भगवान में अटूट श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती।

  8. पै मिठास या मार के रोम-रोम भरपूर - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (30)

    प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण रस से भरपूर हो जाता है। जो प्रेम में अपना बलिदान देता है वही अमरत्व को प्राप्त करता है। प्रेम में गिरता हुआ व्यक्ति ही वास्तव में संभलता है। जो अपने अहंकार को त्याग कर प्रेम की ओर अग्रसर होता है, उसी का जीवन सुधरता है।

  9. अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली खूब - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (33)

    प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे प्रेमी ही अच्छे से जानता है । प्रेम वह वरदान है जो उस प्रेमी के तन एवं मन को उसके प्रियतम से मिलाकर एक कर देता है ।

  10. पै एतोहूँ रम सुन्यौ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (31)

    प्रेम की विलक्षणता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि हमने केवल इतना सुना है कि प्रेम अद्भुत खेल है जिसमें स्वेच्छा से प्राणों की बाज़ी लगाकर दिल से दिल का मेल किया जाता है ।

  11. वा रस की कछु माधुरी ऊधो लही सराहि - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (39)

    प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेमानंद का कुछ माधुर्य उद्भव ने सराहकर ग्रहण किया था । जो प्रेम रस उद्भव को ब्रज में प्राप्त हुआ था उसको अब फिर से कौन प्राप्त कर सकता है ?

  12. भले वृथा करि पचि मरौ ज्ञान गरूर बढ़ाय - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (9)

    भले ही समस्त प्रकार के साधन करके मर जाओ, ज्ञान प्राप्त करके गर्व को बढ़ा लो, परंतु बिना प्रेम के सब कुछ व्यर्थ ही है चाहे करोड़ों उपाय कर डालो। अर्थात् भगवद् प्राप्ति का एक मात्र उपाय प्रेम ही है।

  13. कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (29)

    भगवत्प्रेम की विलक्षणता का अनुभव करते हुए रसिक जन इसे भिन्न-भिन्न स्वरूपों में परिभाषित करते हैं। कोई इसे गले की फाँसी मानता है तो कोई पैनी तलवार; कोई इसे भाला कहता है तो कोई अनोखी ढाल के रूप में इसकी व्याख्या करता है।

  14. प्रेम वारूनी छानि कै बरुन भरा जलधीस - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (4)

    प्रेम की महिमा का गान करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम-मदिरा छानने के कारण वरुण देव जलाधिपति बने, और प्रेमवश विष का पान करने से ही शिव पूजनीय हुए। प्रेम ही सब महिमा का मूल है।

  15. तोरि मानिनी तें हियो फोरि मोहिनी मान - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (50)

    कृष्ण-भक्ति की ओर अपना रुझान प्रकट करते हुए रसखान कहते हैं कि मान करने वाली नारी से हृदय को तोड़कर (अर्थात् उसके प्रेम-बंधनों को छोड़कर) और इस मोहिनी माया के गर्व को नष्ट करके, प्रेम के देवता श्रीकृष्णचन्द्र की शोभा को देखकर मुसलमान धर्मावलम्बी भी अब रसखान (रस की खान) बन गया।

  16. कारज कारन रूप यह - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (47)

    रसखान के अनुसार प्रेम ही सृष्टि का मूल कारण है। जगत की उत्पत्ति और उसकी समस्त क्रियाएँ प्रेम से ही हुई हैं। वही प्रेम कर्ता भी है, कर्म भी है, क्रिया भी है और परमात्मा का वास्तविक स्वरूप भी।