सिद्धान्त की साखी [श्री नागरी देव जी की वाणी]

साखी, श्री नागरीदेव देव जी की वाणी ग्रंथ में श्री नागरीदेव देव जू द्वारा लिखित दोहों का संकलन है।

20 लेख उपलब्ध हैं

  1. ये दोउ विहरत आनन्द उदित - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (20)

    दोनों श्री युगल (श्यामा-कुंजबिहारी) नित्य विहार कर रहे हैं। उनके मन में अद्भुत आनन्द उदित हो रहा है और उनका परस्पर अनुराग मानो अंगराग के समान उनके अंग-अंग में व्याप्त हो रहा है। इस दिव्य प्रेम-विहार को देखकर श्री नागरीदासी आनन्द से फूली नहीं समा रही और उस नूतन सुहाग-रूपी पराग का प्रभाव उनके अंग-अंग एवं रोम-रोम में भी व्याप्त हो रहा है।

  2. अब कोउ कहो कूर कुटिल यह - श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (16)

    हे भाई! चाहे अब कोई हमें क्रूर, कुटिल, कृपण, कामी अथवा मौनी क्यों न कहे — इन बातों की ओर हमारा कोई ध्यान ही नहीं है। श्रीस्वामी हरिदास जी की कृपा से रस-विलासमय श्रीयुगल के अद्भुत नित्य विहार-रस को हम मनभावते भाव से ऐसे निहारते हैं, जैसे कोई गाय के थन को मुँह में लेकर दूध पीता हो।

  3. बिपुल बिहारिनिदासि तैं अब छिन छिन मन आनंद - श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (19)

    श्री बीठलविपुलदेव जू एवं श्री बिहारिनदेव जू के संग से मेरा मन अब प्रतिक्षण आनंद में निमग्न रहता है। इन्हीं की कृपा-बल से नित्य दूल्हा-दुल्हन, श्री श्यामा कुंजबिहारी के रस-बिलास को मैं सतत निहारता रहता हूँ।

  4. श्रीगुरु सन्धि सुभाव न पावत - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (11)

    सर्वोपरि नित्य विहार के दाता स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के सिद्धांत एवं स्वभाव की संधि न प्राप्त होने के कारण, धूर्त लोग केवल संसार के यश को ही गाते हैं । बिना दृढ़ अनन्य उपासना किए नित्य विहार को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है?

  5. कुंज पुलिन कौतिक घनौं मिलि खेलत रस रासि - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (18)

    श्री धाम वृंदावन में, श्री यमुना के तट पर स्थित नवनिकुंजों में, श्री युगल (श्री राधा-कृष्ण) अगाध प्रेम से भरे नए-नए कौतुक खेल रहे हैं। हे नागरीदास! युगल (श्री बिहारी-बिहारिनी) की सहचरी भावापन्न दासियों के संग-संग, तुम भी अपना मन लगाकर इस अद्भुत सुख का सतत अवलोकन करो!

  6. रोग भोग सुख देह दुख - श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (14)

    देह से संबंधित सुख-दुख, रोग-भोग, और सर्दी-गर्मी स्वाभाविक रूप से आते-जाते रहते हैं। अतः हे नागरीदास, इन सभी प्रपंचों को भलीभाँति त्याग कर, श्री युगल (श्यामा-श्याम) के भजन में ही नित्य मन लगाओ।

  7. कै खानों कै सोवनौं - श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (13)

    हे भाई, तुम अपने समय को केवल खाने/पीने, सोने पुन: उठने में ही व्यतीत कर रहे हो, तुम यह बात स्पष्टता से समझ लो कि प्रभु का मन से अनन्य एवं नित्य भजन किए बिना, इस संसार रूपी जंजाल को तुम नहीं तोड़ सकते ।

  8. नादी नृत्य निपुन बहु बांदी - श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (12)

    शब्दों की चातुरी द्वारा वाद विवाद (बहस) करने वाले तो बहुत मिले, परंतु रस का वास्तविक स्वादी (रसिक) एक भी न मिल सका । हे नागरीदास! सहचरी भाव के दृढ़ अनन्य बने बिना, बड़े बड़े चतुर व्यक्ति, परमार्थ की विशुद्ध वस्तु को प्राप्त किए बिना ही चले गये ।

  9. अति निरपेक्ष संग संग्रह - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (3)

    सांसारिक आसक्तियों और संग्रह की प्रवृत्ति से सर्वथा विरक्त होकर, जब साधक स्वामी श्रीहरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' रस को ही अपना परम लक्ष्य मान लेता है, तब श्रीबिहारिनी जू (प्रियाजी) की सखी-भाव से सेवा करते हुए उसका मन उस एकान्तिक निकुंज-महल के परम रस-देश में प्रवेश पाने का अधिकारी बनता है।

  10. हीरा कौं ललिचात लिवासी - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (7)

    ठौर-ठौर पर श्रद्धा रखने वाले जन सर्वोपरी नित्य-विहार-रस रूपी हीरे को ललचाते हैं, परंतु उन्हें इस वस्तु के स्वरूप का ठीक से ज्ञान नहीं है; अर्थात् वे अनन्य धर्म के मर्म को नहीं जानते। इस नित्य-विहार-रस में प्रवेश बिना अनन्य धर्म का पालन किए कदापि नहीं हो सकता।

  11. यहै उपदेस उपाइ श्रीबिहारिनिदासि - श्री नागरीदेव जु की वाणी (5)

    इस अद्भुत नित्य-विहार रूपी सर्वोपरि रस के उपदेश को एक मात्र गुरुदेव (श्री बिहारिन दास जी) की कृपा से ही समझा जा सकता है, क्योंकि नित्य-सिद्धों (एवं उनके कृपा-पात्र जनों) के अतिरिक्त इस मर्म को और कोई नहीं समझ सकता।

  12. आप कहावत रसिक कृपन मति - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (9)

    कुछ लोग संसार में स्वयं को रसिक कहलाते हैं, पर उनकी मति एवं सिद्धांत कृपणता से भरा होता है। वे कर्म, धर्म, विधि, निषेध के चक्करों में फँसे रहते हैं और कायर की भाँति सांसारिक राग-द्वेष और मिथ्या भोग विलास नहीं छोड़ पाते। ऐसे लोग बगुला भक्त के समान ठग होते हैं, जिनका हृदय प्रेम से अछूता रहता है और बाहरी वेशभूषा बनाकर दूसरों को ठगते हैं, इसलिए उनके हृदय में प्रिया-प्रियतम के प्रति अटूट विश्वास नहीं उत्पन्न होता।

  13. नित्य विहार सार सबको, अति दुर्लभ अगम अपार - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (4)

    हे भाई, समस्त परमार्थ-उपासनों का सार एवं अति दुर्लभ, अगम और अपार नित्य-विहार-रस ऐसा है कि उसमें अनन्य धर्म (प्रिया-प्रियतम के विहार) का अनुसरण करने वालों का ही प्रवेश है; मायिक देह-संबंधी सुख की तो उसमें कोई चर्चा ही नहीं।

  14. श्रीनागरीदास अनन्य धन, धर्म सुदृढ उर धारि - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (15)

    श्री नागरीदास जी कहते हैं कि अनन्य भक्ति ही सच्चा धन है, इस धर्म को अपने हृदय में दृढ़ता से धारण कर लो। युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) के अनन्य प्रेम रूपी संपत्ति को अपने हृदय में संचित कर लो; फिर तुम निश्चिंत होकर, पाँव पसार कर परम सुख की नींद सो सकते हो।

  15. लै करुवो कौपीन कामरी - श्री नागरिदेव जू की वाणी (2)

    हाथ में जल का पात्र (करुवा), शरीर पर लंगोटी (कौपीन) और ओढ़ने के लिए काली कमली धारण कर अर्थात् समस्त सांसारिक वासनाओं का भली भांति त्याग कर, जब तुम वृन्दावन के कुंजों और यमुना के तटों पर प्रेम से विचरण करोगे, तभी रस-मय युगल श्री बिहारी बिहारिनी जू तुम्हें मिलेंगे। श्री नागरिदेव जी कहते हैं कि ऐसी स्थिति में ही उस दिव्य युगल की अंतरंग सेवा (खवासी) प्राप्त हो सकेगी।

  16. श्री नागरीदासि अनन्यनि कौ गढ़, बन बाँकौ कहा कोऊ पावै - श्री नागरिदेव जू की वाणी (8)

    हे नागरीदास! यह श्री वृन्दावन रूपी निज-महल अनन्य रसिकों का एकांत रस-विलास का किला है। नित्य-विहार रूपी यह धन नित्य-सिद्धों की निज संपदा है और केवल उनकी कृपा से ही कोई इसे पा सकता है। केवल अपने साधन-बल पर मूँड मुंडाना तो बेकार ही है।

  17. चरनकमल रज सेइहौं मन-बच-क्रम यह आस - श्री नागरिदेव जू की वाणी (1)

    मेरे तन-मन-प्राण और रोम-रोम का सर्वोच्च सर्वस्व तो श्री बिहारी-बिहारिन के चरण-कमलों की रजस्वरूप श्री वृन्दावन ही है। मैं मन, वचन और कर्म से दृढ़ अनन्य भाव रखकर निरंतर उसी का सेवन करता हूँ, उसी को अपना सर्वस्व मानता हूँ और उसी पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ।

  18. चरन कमल रज सेइयौं - श्री नागरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (01)

    अपनी वाणी के शुभारंभ से पूर्व मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि मैं श्री नित्य विहारिणी (श्री राधा), श्री नित्य विहारी (श्री कृष्ण), श्री स्वामी हरिदास जी अथवा समस्त रसिकों के चरण-कमलों की जो यह सम्मिलित रज, श्री धाम वृंदावन की रज के रूप में विद्यमान है, उसको ही मैं अपना सर्वस्व मानकर, उसी रज का मन, कर्म और वचन से सदाकाल दृढ़ भाव से निरंतर सेवन करूँ और उसी पर बलिहारी जाऊँ।

  19. भक्ति भाव विस्वास न उपजे - श्री नागरी देव, श्री नागरी देव जी की वाणी (10)

    श्री राधारानी के चरणों में पूर्ण विश्वास और भक्ति मार्ग में दृढ़ता न होने पर भी घर-घर में लोग अपने आपको रसिक कहलाना चाहते हैं। जब तक श्री राधारानी में अनन्य प्रेम नहीं होगा, तब तक संसार में आवागमन लगा रहेगा और दुःख भोगना ही पड़ेगा; रसिक कहलाने से कुछ नहीं होगा।