समय प्रबंध

समय प्रबंध ललित संप्रदाय के श्री वंशी अली जी के शिष्य श्री अलबेली अली द्वारा लिखित ग्रंथ है।

19 लेख उपलब्ध हैं

  1. गुंजन मधुपन सुनत अलींरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (22)

    प्रभात बेला में जैसे ही सखियों के कानों में भौंरों की मधुर गुंजार पड़ी, वे आनंद-विभोर होकर महल की ओर बढ़ चलीं। उनकी चाल ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो प्रेम की नदी उफनकर रूप के अपार महासागर की ओर प्रवाहित हो रही हो।

  2. बड़े बड़े नयन अरुण रत्नारे - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (68)

    श्रीराधा के बड़े-बड़े नेत्र अरुण रत्नों जैसे लालिमायुक्त हैं। वे रस में ऐसे छके हुए है कि उनींदे-से प्रतीत होते हैं, मानो नींद उनकी पलकों के चारों ओर घूमती फिर रही हो।

  3. लटकत आावत बाहाँ जोरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (186)

    श्री राधा-कृष्ण बाँहों में बाँहें डालकर प्रेम से लहराती हुई चाल में आ रहे हैं । दोनों सुंदर प्रेमी (राधा और कृष्ण) खिलखिलाते हुए, एक-दूसरे का हाथ थामे, घने कुंजों में विचरण कर रहे हैं।

  4. ए दोउ राजत रंग भरे री - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (166)

    युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं।

  5. निरखि निरखि अलि रूप लुभानी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (59)

    जिस प्रकार भौंरे कमल पर मँडराते हैं, उसी प्रकार सहचरी के नेत्र श्री राधा की अलौकिक रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं। उसका रसपान करते हुए भी वे तृप्त नहीं होते अपितु और भी अधिक लालायित रहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप वे पलक झपकना भी भूल जाती हैं।

  6. पायन पायली जगमग जोति - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (109)

    श्री राधा के चरणकमलों में सुसज्जित पायल की ज्योति ऐसी जगमगा रही है मानो नवीन नौ रत्नों के दीपक अपनी दिव्य आभा बिखेर रहे हों जो बड़े, कंचन मोतियों में गुंथे हुए हैं।

  7. गहैं चरन कल ललन लुभावैं - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (108)

    श्री राधा के चरण कमलों के स्पर्श का सुख प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण सदा व्याकुल रहते हैं। श्री राधा के चरण कमल अरुणिम आभा से युक्त हैं और मेहँदी के रंग से अनुरंजित हैं, जिसमें श्री कृष्ण जावक लगते हैं और चित्र बनाते हैं।

  8. जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (170)

    हे प्यारी जू [श्री राधा], जहाँ-जहाँ आप अपने चरणों को रखेंगी, वहाँ-वहाँ मैं अपने नैनों के पाँवड़े बिछाऊँगी। जब-जब आप सघन कुंजों में विहरेंगी, वहाँ चुन-चुन कर मार्ग में फूलों को बिछाऊँगी।

  9. प्यारी तेरे बड़े बड़े नैन सलोने - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (168)

    हे प्यारी जू (श्री राधे)! तुम्हारे बड़े-बड़े नयन अति सलोने हैं, जो चंचल, चपल, अरुण, एवं अनियारे हैं, और जिनकी थोड़ी सी चितवनी ही टोना कर देती है।

  10. लाल की अँखियाँ रूप लुभानी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (41)

    श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं । यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं होती ।

  11. रंग भरी राजत अलकलड़ी री - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (66)

    प्रेम-रंग में भरी अलकलड़ी श्री राधा विराज रही हैं । श्री ललिता जू जल की झारी लिए पास में खड़ी हैं और श्री राधा के सुन्दर अंगों को निहार कर उन्मत्त हैं ।

  12. भोरहिं उठि अलिरूप विचारूं - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (20)

    सखी भाव की उपासना करने वाले साधक को सुबह उठ कर सखी रूप की भावना करना चाहिए, एवं श्री प्रिया प्रियतम की मानसिक सेवा करते हुए उनकी अद्भुत रूप माधुरी का पान करना चाहिए ।

  13. ऐसैं काल बितावों निसिदिन - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध

    ऐसा मेरे जीवन में कब समय आएगा जब मुझे सांझ भोर लगेगी और भोर सांझ लगेगी अर्थात् मैं नित्य ही प्रिया लाल को लाड़ लड़ाऊंगा और मुझे समय का भी आभास नहीं रहेगा ।