श्री माधुरी दास

श्री माधुरी दास, श्री वृंदावन धाम के गौड़ीय रसिक संत एवं श्री रूप गोस्वामी जी के शिष्य थे ।

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  1. तुमसे हम को एक है - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (75)

    हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही एकमात्र शरण व सर्वस्व हैं, किंतु आपके लिए तो मेरे जैसे अनगिनत जीव व अनुरागी हैं। अतः हे प्राणप्रियतम! आप जैसा भी उचित समझें वैसा व्यवहार करें, बस ऐसी कृपा करें कि हमारे इस निष्काम प्रेम की प्रतिज्ञा का सदा निर्वाह होता रहे।

  2. आय निकस ठाड़े भये थकित - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (282)

    जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।

  3. और कहाँ ते सुमरिये - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (112)

    श्री प्रिया-प्रियतम के इस रास-विलास की लीला इतनी अगाध है कि वे मेरी सामर्थ्य से परे है। उनका पूर्ण स्मरण तो दूर, यहाँ तो ऐसी दशा हो जाती है कि ‘राधा’ नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से ही हृदय में अष्ट सात्त्विक भाव प्रकट हो जाते हैं और शरीर में कंपन, रोमांच आदि होने लगते हैं।

  4. वामुख की आशा लगी - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (28)

    अब मुझे केवल उन (प्रिया-प्रियतम) के मुख-दर्शन की ही उत्कंठा लगी है। योग, साधना और अन्य सभी उपायों की आशा मैंने पूर्णतः त्याग दी है। अब यदि शीघ्र ही उनके साथ मेरा मिलन (संजोग) नहीं हुआ, तो ये प्राण भी छूट जाएँगे।

  5. आय कुँवर ठाड़े भये नवल कुंवरि के संग - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (154)

    कुँवर (श्यामसुन्दर) नवल कुँवरि (श्रीराधा) के संग यमुना-पुलिन में वंशीवट पर खड़े हैं जहाँ प्रेम-रस की अनंत तरंगें उमड़ रही हैं।

  6. कहों कहां लों वरनि में वंशीवट की केलि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (297)

    मैं प्रिया-प्रियतम की वंशीवट की उस अद्भुत दिव्य केली लीला को कैसे और कहाँ तक वर्णन करूँ क्योंकि उस रस को वही समझ सकता है जो स्वयं सहचरियों के संग उस लीला-रस में सहभागी होता है।

  7. कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)

    कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं।

  8. पिय प्यारी को विहरिवो - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (298)

    यद्यपि प्रिया-प्रियतम की विहार लीलाओं को हृदय में सदा छुपाकर रखना चाहिए, परंतु मैं जितना-जितना इसे हृदय में छुपाने का प्रयास करता हूँ, वे उतनी ही सहजता से मुख से प्रकट हो जाती हैं।

  9. वा मुख देखन को कहौं - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (24)

    ऐसा कौन-सा उपाय करूँ कि मुझे श्री श्यामा-श्याम के मुख-कमल के दर्शन प्राप्त हो सकें? मैं क्या करूँ, किससे कहूँ? अब तो यह पीड़ा अत्यंत असहनीय हो गई है।

  10. कहा करूँ कासों कहूँ को बूझे कित जाउँ - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (29)

    क्या करूँ, किससे कहूँ, कौन समझेगा, किसके पास जाऊँ? श्री प्रिया-प्रियतम के दर्शन की तीव्र लालसा लिए, श्री धाम वृंदावन के वनों में उनका नाम लेलेकर व्याकुलता पूर्वक डोलता हुआ फिर रहा हूँ।

  11. वृन्दावन विहरहिं सदा गहे परस्पर बाँह - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (4)

    दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे का आलिंगन कर सदा वृंदावन में नित्य विहार करते हैं। मेरे हृदय में उनसे मिलने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी है।

  12. जो मोसों मोसी करौ नाहीं कछु मोहि ठौर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (76)

    यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपके अतिरिक्त अब मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। आप तो परम कृपालु हैं, पतितों को भी अपने हृदय से लगाने वाले हैं। कृपा करके, हे रसिक सिरमौर, अपने उसी स्वभाव वश मुझ दीन पर भी अपनी कृपा बरसाइए।

  13. दसन खँडित वीरी रुचिर दैहैं निकट बुलाय - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (149)

    मेरी यही अभिलाषा है कि कुंवरी श्री राधा अपने सुकोमल हाथों से उनके द्वारा चर्वित पान मुझे अपने निकट बुलाकर प्रदान करेंगी एवं अपने कंठ के हार को मेरे कंठ में पहनाएंगी।

  14. करैं मनोरथ पिय के जो कछु उपजै जीय - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (78)

    प्रियतम श्यामसुन्दर के हृदय की समस्त अभिलाषें को श्री राधा पूर्ण करती हैं । श्री राधिका, श्रीकृष्ण के हृदय (अंक) में सदा विराजती हैं, और श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक उनके चरणों को पलोटते (दबाते) हैं।

  15. जो वन वन डोलत रहों - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (30)

    यदि कोई जीव श्री श्यामाश्याम से मिलने की आशा बाँधकर वृन्दावन के कुंज वनों में डोलेगा, तो अनजाने में ही कहीं न कहीं उसकी उनसे अचानक भेंट अवश्य होगी।

  16. जो गावहिं सुमरहिं सदा मन बच विपिन विलास - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (92)

    जो व्यक्ति मन और वचनों से सदा वृंदावन की लीलाओं का यशोगान और सुमिरन करता है, वह सहज ही आनंद और श्री वृंदावन धाम में वास प्राप्त कर लेता है।​

  17. कठिन मनोरथ मन उठे, को पुरनि करे आनि - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (106)

    मेरे मन में प्रेम भरे दुर्लभ मनोरथ उत्पन्न हो रहे हैं, उन्हें कैसे पूरा करूँ? कोई उपाय नहीं सुझता, केवल श्री लाड़लीजी ही अब कृपा करेंगी मुझे दीन-दुखिया समझकर।

  18. अहो लड़ैती लाड़ली, अलखि लड़ी सुकुमारु - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (35)

    हे लड़ैती लाड़ली श्री राधे! हे अति सुकुमार अलख लड़ी, मनोहारनी किशोरी जू! कृपा कर मुझे अपने सुंदर मुख की थोड़ी सी झलक दिखलाइये ।

  19. श्यामा श्याम बैठे नव - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (290)

    श्री श्यामाश्याम नवीन फूलों की सेज पर विराजमान हैं, और एक-दूसरे की रूप माधुरी का दर्शन कर रहे हैं तथा एक-दूसरे का फूलों से श्रृंगार कर रहे हैं।

  20. वंशीवट तट निकट भूमि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (3)

    यमुना तट के निकट वंशीवट की भूमि सदा वृक्षों और लताओं से आच्छादित हरिभरी रहती है जहां सर्वदा पिय प्यारी (राधा कृष्ण) नित्य विहार पारायण हैं।