रहे चकि लाल चितै मुख बाल - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (52)
नवयुवती प्रिया (श्री राधा) का मुखकमल देख श्री लाल (श्री कृष्ण) चकित रह जाते हैं, और उनका मन प्रियाजी के रूप की लहरों में झूमने लगता है।
श्री राधा कृष्ण के श्रृंगार रस को समर्पित पदों एवं कवित्त को तीन भागों में बाँटा गया है जो श्री हित ध्रुवदास जी द्वारा लिखित 'बयालीस लीला' नामक ग्रंथ का भाग है।
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नवयुवती प्रिया (श्री राधा) का मुखकमल देख श्री लाल (श्री कृष्ण) चकित रह जाते हैं, और उनका मन प्रियाजी के रूप की लहरों में झूमने लगता है।
श्री प्रियाजी (राधा) के कोमल चरण स्वर्ण की आभा से दमकते हैं, और उन पर सजी लाल जावक की रंगत प्रियतम के हृदय को आकृष्ट करने वाली है।
रूप और कोमलता की फूल-छड़ी समान प्रिया, नवल रंगीले लाल के प्रेम में शिथिल हाथों से ऐसे फिसल गईं जैसे फूल की डाली किसी के हाथ से धीरे-धीरे सरक जाए।
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा की गौरवर्णी अंग-कान्ति तप्त स्वर्ण की प्रभा से भी अधिक चमकदार और तेजस्वी है। उनके दिव्य अंगों की सुगंध ऐसी प्रतीत होती है मानो समस्त प्राकृतिक पुष्पों के परिमल को पीछे छोड़ दिया हो। उनकी अंगों की कोमलता ऐसी है कि पुष्पों की मृदुता भी इसके सामने फीकी जान पड़ती है।
सरस रूपमयी मन्द-स्मिता छबि आगरी एवं रंग रंगीली प्रिया रसिक रँगीले लाल को अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं ।
आज नवोढ़ा प्रिया मल्लिका-पुष्पों के सौरभसार से भींगी हुई, पुष्पों के ही वस्त्रालंकारों से अलंकृत हो रही है ।
प्रियतम के प्रेम में डूबी हुई, अद्भुत आभा से युक्त, सौंदर्यमयी लाड़िली ऐसी शोभा धारण किए खड़ी हैं कि उनकी नख-छटा के सामने कोटि-कोटि विद्युत् की चमक भी फीकी पड़ जाती है।
श्री लाड़िली के नुकीले नयन-बाणो ने प्रियतम के मन को बींध दिया है, जिससे वे जके-थके से शिथिल एवं शक्ति-रहित हो गये हैं ।
छबिमयी लाड़िली की मनोरम छबि का दर्शन करके सौन्दर्य-धाम प्रियतम अपलक दृष्टि से उन्हें देखते ही रह जाते है ।
श्री लाड़िली की विलक्षण चितवन, मनमोहिनी मुस्कान एवं ललित पदन्याय ने श्री लाल का मन हरण कर लिया है।
हे सखि! श्री लाड़ली-लाल दोनों ही अपने कुञ्ज से निकलकर यमुना के तट पर खड़े हुए हैं, और लाड़ली प्रिया आज कुछ विलक्षण छबि-छटा से युक्त हैं।
रूप की फूल-छड़ी जैसी तन्वंगी प्रिया, ललित हाव-भावों से भरपूर हैं, और उनकी अद्भुत भाव-भंगिमाएँ एवं मृदुता भी अनिर्वचनीय हैं।
इस आशंका से ही कि मेरी दृष्टि का प्रिय पर भार न पड़े, प्रियतम श्रीलाल जी प्रिया को दृष्टि भर कर नहीं देखते हैं। सुकुमारी प्रिया, प्रियतम को नयन एवं प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।
प्रियतम की प्यारी श्री राधा ऐसी सुकुमारी हैं, जिन्हें हारावली का अल्प सा भार भी बहुत भारी प्रतीत होता है, फिर भी प्रेमावेश में उन्होंने रसिक रँगीले लाल को अपना हृदय-हार बना रखा है।
श्री प्रिया जी का हास्य कुसुम निर्झर के समान है, और उनका अवलोकन सरस सुधा-प्रवाह के समान है। उनके सर्वांग स्वरूप से रूप-सौंदर्य की वर्षा होती रहती है।
जब तक अलबेली कोमलांगिनी प्रिया प्रियतम के सम्मुख रहती हैं, तभी तक ही प्रियतम अपनी देह में प्राणों का अनुभव करते हैं।
छवि मूर्तिमान होकर श्री राधारानी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी है, और रूप एवं कला उनके लिए चँवर ढुला रहे हैं। घन-दामिनी श्री राधा के अंग को प्रकाशित कर सेवा में रत है, और रति स्वयं को उन पर न्योछावर कर रही है।
जिस मुखछवि की कान्ति का अवलोकन करके नवल रसिक राय कृतकृत्य होते हैं, उसके लिए चंद्रमा की उपमा क्या है?
आज अलबेली प्रिया अलबेले ढंग से हिंडोले में झूल रही हैं, जिनकी सहज छबीली छवि को रंगीले नवल लाल देख-देखकर निहाल हो रहे हैं।
श्री कृष्ण की प्रिया श्री राधिका वृंदावन की फुलवारी में खड़ी हैं। उनके तन पर आकर्षक फूलों वाली साड़ी सजी हुई है।