सिद्धान्त की साखी [व्यास वाणी]

सिद्धान्त की साखी, ग्रंथ व्यास वाणी में श्री हरिराम व्यास द्वारा लिखित सिद्धांत के दोहों का संकलन है।

83 लेख उपलब्ध हैं

  1. झूठ मसकरी मन लगै हरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)

    सांसारिक जीव का मन व्यर्थ की बातों और हँसी-मज़ाक में तो सहज ही लग जाता है, किन्तु श्रीहरि के भजन के समय वह टालमटोल करने लगता है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे जीव की भजन-विमुखता देखकर भक्ति स्वयं पुकारती हुई उनकी देहली से ही लौट जाती है।

  2. व्यास वसैं वनखण्डमें करें निरंतर ध्यान - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (139)

    यद्यपि कोई साधक वन में एकांत वास करता हो और निरंतर भगवद्-ध्यान में ही मग्न रहता हो, तथापि यदि उसके अंतःकरण में अन्य भक्तों के प्रति लेशमात्र भी अभिमान है, स्वयं को श्रेष्ठ मानने का अहंकार अथवा किसी अन्य भक्त को लघु समझने एवं उनके प्रति ईर्ष्या-द्वेष विद्यमान है, तो उसे भगवान की प्राप्ति सर्वथा असंभव है; क्योंकि प्रभु केवल निरभिमान और निष्कपट भाव से ही प्रकट होते हैं।

  3. खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (34)

    सांसारिक लोग किसी पारखी की भाँति केवल लाभप्रद वस्तु का ही चयन करते हैं अर्थात् अपने स्वार्थ सिद्धि के अनुसार ही सम्बन्ध जोड़ते हैं। किन्तु नन्दलाल श्रीकृष्ण एक विलक्षण गाहक हैं, जो मुझ जैसे सर्वगुणहीन और दोषपूर्ण जीव को भी निष्काम भाव से अपना लेते हैं। अतः एक अनन्य भक्त के लिए श्री कृष्ण ही एकमात्र सच्चे और परम कृपालु आश्रय हैं।

  4. व्यास न व्यापक देखिये निर्गुण परै न जानि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)

    श्री हरिराम व्यासजी कहते हैं कि वह परब्रह्म सर्वव्यापक होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देता और निर्गुण होने के कारण बुद्धि की पहुँच से परे है। तब अपने भक्तों के कल्याण और उन्हें रसास्वादन कराने के लिए, वही परम तत्व श्री राधावल्लभ के रूप में साक्षात् प्रकट होकर अवतरित हुआ है।

  5. नर देही द्वारौ खुल्यौ हरि पावन की घात - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)

    मानव देह रूपी दुर्लभ अवसर भगवान हरि की प्राप्ति तथा जन्म–मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त होने का खुला हुआ द्वार है। श्री हरिराम व्यास जी सचेत करते हैं कि यदि यह अमूल्य अवसर एक बार हाथ से निकल गया, तो फिर भगवद्-प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती—जैसे वृक्ष से टूटा हुआ पत्ता दोबारा उससे नहीं जुड़ सकता।

  6. व्यास कुलीननि कोटि मिलि पंडित लाख पचीस - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (16)

    यदि करोड़ों उच्च कुलीन जन और लाखों-पचीस विद्वान पंडित भी एकत्र हो जाएँ, तो उन सभी के शीश एकत्र होकर भी उस वृंदावन के स्वपच की चरण-रज की बराबरी नहीं कर सकते जो यद्यपि अत्यंत नीच कुल में उत्पन्न हुआ है, परंतु भगवान का भक्त है ।

  7. व्यासहि बॉमन जिनि गनौं हरिभक्तन कौ दास - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (14)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं “मुझे ब्राह्मण मत गिनो, मैं तो हरिभक्तों का दास हूँ”। श्रीराधावल्लभ लाल जी के प्रेम में, संसार के समस्त ताने और उपहास को मैंने विभोर होकर ग्रहण किया है ।

  8. व्यास राधिका-रवन बिनु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (31)

    श्री राधिका रमण युगल सरकार, जो सबके मूल स्रोत हैं, उनके बिना मुझे कहीं भी सच्चा आनंद प्राप्त नहीं हुआ। संसार की प्रत्येक डाल-डाल पर भटकते-भटकते मैं उलझ गया और हर पत्ते ने मुझे केवल दुःख ही दिया।

  9. हरि हीरा गुरु जौहरी व्यासहि दियो बताइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (23)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि हरि दिव्य हीरे के समान हैं, और गुरु उस हीरे को तराशने वाले कुशल जौहरी के समान हैं। भगवन्नाम लेने से तन और मन दोनों में परमानंद की अनुभूति होती है।

  10. श्री राधावल्लभ परम धन - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (5)

    श्री राधावल्लभ ही परम धन हैं, और व्यासजी ने हर्षित होकर इस अमूल्य संपदा को लूटा है। यह ऐसा दिव्य खजाना है कि चाहे जितना निरंतर निकालो, इसका भंडार सदा भरा हुआ ही रहता है।

  11. व्यास पराई कामिनी कारी नागिन जानि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (105)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि पराई स्त्री को काली नागिन के समान मानना चाहिए। यदि किसी ने कामुक दृष्टि से उन्हें भोगने की कामना की, तो सम्पूर्ण जीवन के सर्वनाश का कारण बनता है। इससे बचने का केवल एक ही गरुड़ मंत्र (साँप का विष उतारने का मंत्र) है कि उनसे सदैव दूरी बनाए रखो।

  12. अपनैं-अपनैं मत लगे वादि मचावत सोर - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (135)

    अपने अलग-अलग मतों को लेकर बेकार में ही सब लोग शोर मचा रहे हैं। जैसे-तैसे, सबको किसी न किसी रूप में, उस एक नंदकिशोर (परम भगवान जो सर्वव्यापक है) का ही तो भजन करना है।

  13. जिनके मुख गोपालजी पावन हरि गुन गीत - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (66)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जिनके मुख प्रेमपूर्वक श्री हरि के पावन गुणों का गान करते हैं, उन्हें मेरा युगों-युगों का मित्र मानना।

  14. व्यास विदित चतुराइयनि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (53)

    कुछ कपटी ऐसे होते हैं जो स्वयं तो सदा संसार में आसक्त रहते हैं परंतु दूसरों को संसार से अनासक्त कराने का उपदेश देते रहते हैं । जो स्वयं कभी नाव पर चढ़ा ही न हो वो स्वयं को (अथवा दूसरे को) समुद्र से पार कैसे करा सकता है ?

  15. व्यास रसिक सब चलि बसे नीरस रहे कुवंश - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (98)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि वास्तविक रसिक (प्रेमी) तो सब चले गए, अब तो केवल नीरस हृदय वाले कुवंश ही बचे हैं मानो निर्मल सरोवर के राजहंस छल-कपट से भरे बगुलों की संगति त्यागकर दूर चले गए हों।

  16. व्यास नाम सम नाम है - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (85)

    भगवान के नाम के समान उनका नाम ही है, जिसकी कोई समानता नहीं है। यह जग-विख्यात है कि नामी से ही नाम प्रकट होता है, फिर भी नाम नामी से श्रेष्ठ है।

  17. व्यास न कबहूँ उपजि है - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (96)

    श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि संतों की कृपा से विषयों के प्रति अनुराग जड़ से समाप्त हो गया है । बिना संत चरण रज पान किए ह्रदय के ताप कभी शांत नहीं होते ।

  18. व्यास बड़े हरिके जना - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (62)

    श्रीहरि के वे अनन्य भक्त ही वास्तव में महान हैं जो अहर्निश उनके पावन यशोगान में मग्न रहते हैं। जिन्होंने तन, मन और वाणी से श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य किसी भी लौकिक विषय का अवलंब नहीं लिया, वे ही परम वंदनीय हैं।

  19. राधा-वल्लभ ध्याइ कैं और ध्याइयै कौंन - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (4)

    सब अवतारों के मूल श्री राधावल्लभ जी का ध्यान करने के बाद अब अन्य किसका ध्यान किया जाए? जैसे भोजन में एक साथ नमक डालते हैं, वैसे ही एक-एक 'बरी' (दाल की पकौड़ी) पर नमक डालने का कष्ट कौन करे? अर्थात् श्री राधावल्लभ का ही अनन्य भजन करना चाहिए।

  20. व्यास न साधन और सब, हरि सेवा समतूल- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (91)

    श्री हरि की निष्काम सेवा ही सभी साधनों का सार है। जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से समस्त पत्ते-पुष्प तृप्त हो जाते हैं, वैसे ही हरि-सेवा से सभी आध्यात्मिक साधन स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।