आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी
मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।
सुंदरदास (1596–1689) भारत के एक महान कवि और संत थे। वे संत दादूदयाल के शिष्य थे। उन्हें हिंदी साहित्य का “शंकराचार्य” माना जाता है।
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मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।
उस परम तत्व, भगवान (श्री कृष्ण) की महिमा का वर्णन करते-करते वेद थक गए, तत्त्ववेत्ता थक गए और ग्रन्थ भी दिन-रात उसका गुणगान करते-करते थक गए। शेष, शिव और इन्द्र जैसे देवता भी उसकी खोज अनेक प्रकार से करते रहे, परन्तु उसकी पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
बैठना, उठना और सम्भाषण—सब कुछ उस ब्रह्म का ही रूप है। जाग्रत अवस्था हो या निद्रा, अथवा जगत में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उन समस्त प्रपंचों में केवल उस एक ही परमात्म-तत्व का दर्शन करना ही वास्तविक सम्यक-दृष्टि है।
योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थाटन, व्रत और दान—ये सभी साधन मिलकर भी 'संत-सेवा' की समानता नहीं कर सकते।
कोई नंगे पाँव फिरता है, कोई फटे कपड़े पहनता है, वे अपने शरीर को कष्ट देकर केवल अपना वैराग्य दिखाना चाहते हैं।
मैं इस मन की विचित्र गति को क्या कहूँ? कभी इसकी प्रवृत्ति कुत्ते जैसी प्रतीत होती है, जो लोभ और भूख से हमेशा व्याकुल रहता है; कभी सियार जैसी, जो छल-कपट से भरा है; और कभी बिल्ली जैसी, जो बाहर से शांत किन्तु भीतर से धूर्त होती है।
जिसमें न काम है, न क्रोध है; न लोभ, न मोह; न अहंकार, न ईर्ष्या; उसमें कोई भी विकार नहीं है।
कोई शरीर पर भस्म लगाता है, कोई पूरी तरह नग्न होकर दिगंबर बन जाता है। कोई सफेद वस्त्र पहनता है, कोई वृक्षों की छाल के रंगे हुए अनेक प्रकार के वस्त्र पहनता है।
हे मेरे परम प्रिय प्रभु! आप ही एकमात्र मेरे प्रियतम हैं। आप किस कारण मुझसे छिपे हुए हैं? अब स्वयं को प्रकट कर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते!
जिस मन की दृष्टि बार-बार स्त्री की ओर जाती है, वह धीरे-धीरे उसी रूप में ढलने लगता है।
जब कोई साधक सारे सांसारिक और पारमार्थिक आश्रयों का पूर्णतः त्याग कर, अनन्य भाव से केवल भगवान का स्मरण और भजन करता है, तब वह सच्ची भक्ति का अधिकारी बनता है।
यदि कोई देवता बन जाए, या स्वर्ग के राजा इंद्र का पद प्राप्त कर ले, तो इसमें क्या विशेष है? क्योंकि यह तो मायिक एवं क्षणिक है। विधि के विधान के अनुसार, उसे दोबारा मृत्यु लोक में लौटना ही पड़ेगा।
यद्यपि उसने अपने घर का त्याग कर, पारिवारिक जनों के स्नेह का नाता भी तोड़ लिया है और अपने शरीर को भी भस्म से भली-भाँति संवार लिया है।
किसी को सज्जन पिता, माता, भाई, बेटा और सुंदर स्त्री मिलते हैं, जिन्हें पाकर वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।
कोई उनकी निंदा करता है, तो कोई वंदना करता है, तो कोई उन्हें आकर भिक्षा देता है।
भले ही आप आठों याम यम-नियम का पालन करते हों, आपके हृदय में प्रेम हो, आठों याम योग-यज्ञ एवं बहुत दान करते हों।
प्रीति की रीति कुछ भी शेष नहीं रहने देती, न जाति, न पंथ और न ही कुल का गौरव।
चाहे साँप काट ले, या बिच्छू भी डस ले, तो भी समझो अभी भला ही हुआ है। चाहे शेर खा जाए, या हाथी मार डाले, तो भी कोई हानि नहीं है।
जिसको श्याम सुंदर से सच्चा प्रेम हो गया उसके ह्रदय से स्वतः ही समस्त घर बार एवं रिश्तेदारों की आसक्ति छूट जाती है।
जैसे मछली पानी के बिना मर जाती है और सांप अपनी मणि से अलग होने पर जीवित नहीं रह सकता ।