श्री सुंदर जी

सुंदरदास (1596–1689) भारत के एक महान कवि और संत थे। वे संत दादूदयाल के शिष्य थे। उन्हें हिंदी साहित्य का “शंकराचार्य” माना जाता है।

21 लेख उपलब्ध हैं

  1. आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

    मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् परमेश्वर प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है।

  2. वेद थके कहि तत्र थके - श्री सुंदरदास जी

    उस परम तत्व, भगवान (श्री कृष्ण) की महिमा का वर्णन करते-करते वेद थक गए, तत्त्ववेत्ता थक गए और ग्रन्थ भी दिन-रात उसका गुणगान करते-करते थक गए। शेष, शिव और इन्द्र जैसे देवता भी उसकी खोज अनेक प्रकार से करते रहे, परन्तु उसकी पूर्ण सीमा नहीं पा सके।

  3. बैठत केवल उठत केवल - श्री सुंदरदास जी

    बैठना, उठना और सम्भाषण—सब कुछ उस ब्रह्म का ही रूप है। जाग्रत अवस्था हो या निद्रा, अथवा जगत में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उन समस्त प्रपंचों में केवल उस एक ही परमात्म-तत्व का दर्शन करना ही वास्तविक सम्यक-दृष्टि है।

  4. श्वान कहूं कि शृगाल कहूं कि - श्री सुंदरदास जी

    मैं इस मन की विचित्र गति को क्या कहूँ? कभी इसकी प्रवृत्ति कुत्ते जैसी प्रतीत होती है, जो लोभ और भूख से हमेशा व्याकुल रहता है; कभी सियार जैसी, जो छल-कपट से भरा है; और कभी बिल्ली जैसी, जो बाहर से शांत किन्तु भीतर से धूर्त होती है।

  5. कोउक अंग बिभूति लगावत - श्री सुंदर जी

    कोई शरीर पर भस्म लगाता है, कोई पूरी तरह नग्न होकर दिगंबर बन जाता है। कोई सफेद वस्त्र पहनता है, कोई वृक्षों की छाल के रंगे हुए अनेक प्रकार के वस्त्र पहनता है।

  6. होइ अनन्य भजै भगवंत हि - श्री सुंदर जी

    जब कोई साधक सारे सांसारिक और पारमार्थिक आश्रयों का पूर्णतः त्याग कर, अनन्य भाव से केवल भगवान का स्मरण और भजन करता है, तब वह सच्ची भक्ति का अधिकारी बनता है।

  7. देव हू भये तै कहा - श्री सुंदर जी

    यदि कोई देवता बन जाए, या स्वर्ग के राजा इंद्र का पद प्राप्त कर ले, तो इसमें क्या विशेष है? क्योंकि यह तो मायिक एवं क्षणिक है। विधि के विधान के अनुसार, उसे दोबारा मृत्यु लोक में लौटना ही पड़ेगा।