श्री वृन्दावन शतक (श्री हरे कृष्ण जी)

श्री वृन्दावन शतक डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’ द्वारा रचित है जिनमें वृन्दावन का गुणगान है जिन्हें सौ दोहों एवं पदों में पिरोया गया है।

36 लेख उपलब्ध हैं

  1. इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (5)

    गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है।

  2. कीर्तन के यूथ देख उठती उमंग एक - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (3)

    श्री धाम वृन्दावन में कीर्तन-मंडलियों को देखकर हृदय में उमंग उठती है। गोवर्धन पर दृष्टि पड़ते ही गोवर्धन-धारण करने वाले कृष्ण की स्मृति हो जाती है।

  3. वृन्दावन-वृक्ष हैं कि पारिजात नन्दन के - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (6)

    क्या ये वृंदावन के साधारण वृक्ष हैं, या स्वयं स्वर्ग के पारिजात वृक्ष हैं? क्या ये शाखाएँ हैं, या किसी दिव्य प्रेम के अंजन से अभिषिक्त दिव्य शलाकाएँ?

  4. मोहन तड़ाग बाग फूल फल मोहन हैं - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (14)

    यहाँ के तालाब (तड़ाग), बाग-बगीचे, फूल और फल सब मोहन (मन को मोहित करने वाले) हैं। यहाँ की गायें, पर्वत और गोवर्धन भी मोहन हैं।

  5. शक्ति नहीं ध्रुव सी अखण्ड तप कैसे करूं - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (76)

    नाथ! मुझमें ध्रुव के समान ऐसी शक्ति नहीं कि अखंड तप कर सकूँ, और न ही प्रह्लाद के समान ऐसी भक्ति है कि निरंतर भगवद् नाम का स्मरण कर सकूँ।

  6. स्वर्ग में कहाँ है मधुर ध्वनि राधे राधे की - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (12)

    स्वर्ग में कहाँ “राधे राधे” की मधुर धुन सुनाई देती है? स्वर्ग में कहाँ हैं वे मनमोहक कुंज एवं वन?

  7. काँटेदार करील के वृक्ष जिस भूमि पर - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (30)

    जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं।

  8. कलित कदम्बों के कमनीय केलि कुंजों में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (33)

    जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो।

  9. वृन्दावन वास कर रज में विश्राम भला - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (88)

    श्री वृंदावन धाम में वास करते हुए यहाँ की रज में विश्राम करना अच्छा है, न कि मखमली गद्दों से प्रेम बनाए रखना।

  10. कौन दिन होगा नाथ - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (77)

    हे नाथ, ऐसा कौन सा दिन होगा जब मैं वृन्दावन में बसूँगा ? जहाँ नित्य प्रातःकाल उठकर श्री यमुना जी में स्नान करूँगा।

  11. जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (40)

    ब्रजवासी बालक कहता है: जहां जन्म लेने के लिए देवताओं का राजा भी तरसता है ऐसी पवित्र भूमि श्री धाम वृंदावन में भाग्य से हमारा जन्म हुआ है।

  12. ऐसी क्या आवश्यकता दुकूल सुखकारी की - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (79)

    रेशमी वस्त्रों की ऐसी क्या आवश्यकता है हम तो वृंदावन की प्यारी रज को ही अपनी देह से लगायेंगे।

  13. जाये जिसे जाना हो हिमालय तप करने - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (73)

    जिसे हिमालय जाकर तप करना हो वो वहाँ जाकर खूब तपस्या करे, जिसे प्यारी गंगा के किनारे जाना हो वह भी शीघ्र वहाँ जाए।

  14. धन्य धन्य वृंदावन बासी विलाव चूहे जो - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (27)

    धन्य धन्य हैं वृंदावन के चूहे जो वृंदावन के मंदिरों के भीतर घुसकर प्रभु का प्रसाद प्राप्त करते है।