जय हो सदैव श्री गोविन्ददेव - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (1)
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
श्री वृन्दावन शतक डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’ द्वारा रचित है जिनमें वृन्दावन का गुणगान है जिन्हें सौ दोहों एवं पदों में पिरोया गया है।
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श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो।
गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है।
देश-देशान्तर के अनेक व्यक्ति यहाँ खिंचे चले आते हैं, जिनके हृदय में प्रेम की प्रज्वलित ज्वाला धधक रही है।
श्री धाम वृन्दावन में कीर्तन-मंडलियों को देखकर हृदय में उमंग उठती है। गोवर्धन पर दृष्टि पड़ते ही गोवर्धन-धारण करने वाले कृष्ण की स्मृति हो जाती है।
क्या ये वृंदावन के साधारण वृक्ष हैं, या स्वयं स्वर्ग के पारिजात वृक्ष हैं? क्या ये शाखाएँ हैं, या किसी दिव्य प्रेम के अंजन से अभिषिक्त दिव्य शलाकाएँ?
यहाँ के तालाब (तड़ाग), बाग-बगीचे, फूल और फल सब मोहन (मन को मोहित करने वाले) हैं। यहाँ की गायें, पर्वत और गोवर्धन भी मोहन हैं।
नाथ! मुझमें ध्रुव के समान ऐसी शक्ति नहीं कि अखंड तप कर सकूँ, और न ही प्रह्लाद के समान ऐसी भक्ति है कि निरंतर भगवद् नाम का स्मरण कर सकूँ।
स्वर्ग में कहाँ “राधे राधे” की मधुर धुन सुनाई देती है? स्वर्ग में कहाँ हैं वे मनमोहक कुंज एवं वन?
जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं।
जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो।
भक्तों के विहार के लिए, भारत भूमि पर, श्री गोविंद ने स्वयं गोलोक को उतारा है।
आज भी यमुना जी तटों से होकर बहती है। वंशीवट के मध्य में रास मंडल फैला हुआ है।
श्री वृंदावन धाम में वास करते हुए यहाँ की रज में विश्राम करना अच्छा है, न कि मखमली गद्दों से प्रेम बनाए रखना।
हे नाथ, ऐसा कौन सा दिन होगा जब मैं वृन्दावन में बसूँगा ? जहाँ नित्य प्रातःकाल उठकर श्री यमुना जी में स्नान करूँगा।
श्री राधा कृष्ण के प्रेमियों की संगती में प्रेम से रहो एवं प्रेम से ही श्री यमुना जल में स्नान करो।
ब्रजवासी बालक कहता है: जहां जन्म लेने के लिए देवताओं का राजा भी तरसता है ऐसी पवित्र भूमि श्री धाम वृंदावन में भाग्य से हमारा जन्म हुआ है।
रेशमी वस्त्रों की ऐसी क्या आवश्यकता है हम तो वृंदावन की प्यारी रज को ही अपनी देह से लगायेंगे।
जिसे हिमालय जाकर तप करना हो वो वहाँ जाकर खूब तपस्या करे, जिसे प्यारी गंगा के किनारे जाना हो वह भी शीघ्र वहाँ जाए।
धन्य धन्य हैं वृंदावन के चूहे जो वृंदावन के मंदिरों के भीतर घुसकर प्रभु का प्रसाद प्राप्त करते है।
ब्रज-रस रसिकजन स्वर्ग जाने की तुलना में वृंदावन जाने के लिए अधिक उत्साहित रहते हैं।