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  1. पुनि बैठी कुंज-महल मैं संग - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (65)

    फिर श्रीराधा श्यामसुन्दर को अपने साथ लेकर कुंज-महल में विराजित हो गईं। वे दोनों परस्पर गले में बाँहें डालकर तकिये के सहारे लेटे हुए हैं, जहाँ उनके अंगों के स्पर्श और आलिंगन से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो साक्षात् कामदेव ही सुशोभित हो रहा हो।

  2. रंग सरोवर श्री बिपुन प्रिया-लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (38)

    श्रीवृंदावन रूपी रंग-सरोवर में श्रीप्रिया और लाल जी दोनों सुंदर हंसों के समान क्रीड़ा कर रहे हैं। रसिक रूपी कमलों के मुकुटमणि ये दोनों युगल परस्पर एक-दूसरे के अधर-सुधा के अत्यंत मधुर रस का आचमन कर रहे हैं।

  3. वन्दौं श्रीराधा-हरिकौ अनुराग तन - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (03)

    मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य अनुराग की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों।

  4. श्री विपुल बिहारनिदास को मैं पायो - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (17)

    श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।

  5. नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

    परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।

  6. बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

    हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।

  7. ललिता श्रीहरिदासी के आँगन सुखद - श्री राधाशरण देव

    स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।

  8. उमॅगि-उमॅगि आये चहुँदिसि बदरा - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (55)

    चारों दिशाओं से उमड़-उमड़कर कामदेव के अनुराग से सराबोर श्याम घटाएं घिर आई हैं। उन मेघों में सौंदर्य रूपी अमृत से भरी हुई बिजली चमक रही है, जिससे संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है।

  9. जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को - श्री रूपचंद जी ‘भूप’

    साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।

  10. कुँवरि चाल सखि देखि कै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, रंग हुलास (43)

    श्री राधा की परम मनोहर चाल को देखकर श्रीकृष्ण अपनी ही गति-मति भूल गए। श्री राधा जू के विशाल नेत्रों की रसभरी चितवन को निहारकर वे चित्र के समान खड़े के खड़े रह गये।

  11. राधे जू रंग भीनी राजकुँवारि - श्री किशोरी अलि

    श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।

  12. मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

    हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।

  13. नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

    आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो।

  14. कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)

    हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ।

  15. हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (34)

    हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।

  16. वृन्दावनधाम नीको व्रजको विश्राम नीको - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (85)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत सुंदर है, ब्रज मंडल का परम विश्राम सुखद है। श्यामा श्याम का नाम परम सुंदर एवं कल्याणकारी है और उनका यह धाम आनंद का साक्षात मंदिर है।

  17. मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

    मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है।

  18. करुणा करि वन वास दीजिए - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

    हे स्वामिनी! कृपा करके मुझे अपने निज धाम श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये। हे करुणामयी! क्या कारण है कि आपने मुझे अपनी स्मृति से विस्मृत कर दिया है? हा राधे! आपने मुझे अपने महल की टहल (सेवा) से क्यों वंचित कर दिया? मुझसे ऐसा कौन सा अपराध बन पड़ा है जिसे आपने अपने हृदय में धारण कर लिया है?