ठाड़े री मोहन चरण पहाड़ी - श्री हित वृंदावन दास जी
हे सखी! श्रीमोहन चरण पहाड़ी पर खड़े हैं। वायु के वेग से उनका पीतांबर फहरा रहा है और मस्तक पर झुके मुकुट की शोभा अत्यंत न्यारी लग रही है।
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हे सखी! श्रीमोहन चरण पहाड़ी पर खड़े हैं। वायु के वेग से उनका पीतांबर फहरा रहा है और मस्तक पर झुके मुकुट की शोभा अत्यंत न्यारी लग रही है।
हे प्यारी जी (श्रीराधाजू)! आप अद्भुत रूप-सौंदर्य की राशि हैं। आपके अत्यंत मनोहर मुखारविंद की दिव्य आभा पर शरद पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमा भी न्योछावर हैं।
श्री कृष्ण की आनंद और प्रेम-रस से भरी तिरछी चितवन तथा उनकी अत्यंत सुंदर मुस्कान मन को बहुत सुहावनी लगती है।
जिस जीव पर श्रीराधा-कृष्ण के युगल प्रेम का रंग चढ़ जाता है, वह दंपति सरकार के श्रीअंगों की शोभा निरखते ही एक पल में तीनों लोकों के समस्त सुखों को भूल जाता है।
हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता?
हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं।
आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है।
आज बंशीवट पर प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। यमुना जी के तट पर अत्यंत सुखद और शीतल मंद समीर बह रही है तथा विभिन्न प्रकार के पक्षी मधुर कलरव कर रहे हैं।
श्रीप्रिया जी रात भर प्रियतम श्यामसुंदर के साथ जागती रही हैं। उनके सुवर्ण के समान कांतियुक्त कपोलों की सुंदर आभा पर प्रियतम के वस्त्रों की छाप अंकित है, जो अत्यंत सुशोभित हो रही है।
श्रीकृष्ण का श्याम वर्ण अत्यंत मनमोहक है, उनके नेत्र सलोने और चित्ताकर्षक हैं तथा उनके मुखमंडल पर घुंघराली अलकें बलखा रही हैं।
फिर श्रीराधा श्यामसुन्दर को अपने साथ लेकर कुंज-महल में विराजित हो गईं। वे दोनों परस्पर गले में बाँहें डालकर तकिये के सहारे लेटे हुए हैं, जहाँ उनके अंगों के स्पर्श और आलिंगन से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो साक्षात् कामदेव ही सुशोभित हो रहा हो।
श्रीवृंदावन रूपी रंग-सरोवर में श्रीप्रिया और लाल जी दोनों सुंदर हंसों के समान क्रीड़ा कर रहे हैं। रसिक रूपी कमलों के मुकुटमणि ये दोनों युगल परस्पर एक-दूसरे के अधर-सुधा के अत्यंत मधुर रस का आचमन कर रहे हैं।
मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य अनुराग की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों।
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उन्हें श्री विट्ठलविपुल देव जी तथा श्री बिहारिन देव जी का पूर्ण सत्संग प्राप्त हुआ है। ऐसे अनन्य रसिकों के प्रभाव से श्री प्रिया-प्रियतम के प्रति जो अनन्य अनुराग प्रकट हुआ है, उससे उनका चित्त नित्य प्रफुल्लित और आनंदित रहता है।
श्री वृन्दावन की सघन कुंजों में नवीन पत्ते और पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, और वहाँ शीतल, मंद तथा सुगंधित त्रिविध पवन धीरे-धीरे बह रही है।
परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है।
हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए।
स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।
चारों दिशाओं से उमड़-उमड़कर कामदेव के अनुराग से सराबोर श्याम घटाएं घिर आई हैं। उन मेघों में सौंदर्य रूपी अमृत से भरी हुई बिजली चमक रही है, जिससे संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।