ललित मोहिनी देव जू की वाणी
ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रसोपासना पंथ के अनुयायियों के लिए रस काव्य, श्री ललित मोहिनी देव द्वारा रचित, जो श्री हरिदासी सम्प्रदाय के आठवें आचार्य थे, द्वारा लिखित वाणी है। ललित मोहिनी देव जी के ही प्रसिद्ध शिष्य श्री भागवत रसिक थे।
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ललित सरोवर ललित वन ललना लाल समेत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी (17)
अति सुंदर सरोवर, अत्यंत मनोहर वन, और प्रियतमा श्रीराधा (ललना) तथा प्रियतम श्रीकृष्ण (लाल) के सहित ये निकुंज और लीला-शैया ही श्री वृंदावन धाम के प्राकट्य का मुख्य प्रयोजन और परम प्रेम का स्वरूप हैं।
आज समाज सहज मन भायौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)
आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है।
उमॅगि-उमॅगि आये चहुँदिसि बदरा - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (55)
चारों दिशाओं से उमड़-उमड़कर कामदेव के अनुराग से सराबोर श्याम घटाएं घिर आई हैं। उन मेघों में सौंदर्य रूपी अमृत से भरी हुई बिजली चमक रही है, जिससे संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है।
हमारे यहाँ के साधु प्रसाद न चाहें - श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (13)
हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं।
आजु बधाई वृंदावन सुख-सिंधु हिलोर - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (62)
आज इस दिव्य वृन्दावन में बधाई है, जहाँ सुख का सागर निरंतर तरंगायित हो रहा है। प्रिया-लाल अपने तन और मन से उल्लासित हो रहे हैं, और कामदेव-रूपी मेघ गंभीर स्वर में गर्जना कर रहे हैं।
पिय पियरी सेज बनाई आज - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (47)
प्रियतम ने आज पीली सेज सजाई है। चारों ओर की चमक-दमक भी पीली ही पीली है। अपने अंगों को भी इन्होने पीले वस्त्रों से सजाया है।
गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (35)
यह कैसी विडंबना है कि वृंदावन के रसोपासक गुरुजन तो अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। वे फूटा हुआ करुआ रखते हैं, श्रीधाम वृंदावन की पावन रज को अपने तन-मन पर धारण करते हैं, और निष्कपट भक्ति में लीन रहते हैं।
रोम-रोमनि अरुझि विलसत कामिनी - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (49)
दिव्य प्रेम रूपी कामनाओं से भरे दोनों (प्रिय-प्रियतम) इस प्रकार रस-विलास कर रहे हैं कि एक की रोमराजि दूसरे की रोमावली में उलझी हुई है। अँग-अँग में समाया हुआ है, मन मन में बस गया है। सुखमय यामिनी (रात्रि) में रस की बाढ़ आ रही है।
आवनौ जावनौ कहूं नाहीं - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (64)
हम श्रीवृन्दावन को त्यागकर अन्यत्र कहीं जाते-आते नहीं क्योंकि यहीं श्रीहरि हमारे मन के समस्त भावों का पोषण करते रहते हैं और हम श्रीहरि के भावों का (पोषण करते रहते हैं)।
रंग हिडोरना री झूलत लाडिली पिय के संग - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (66)
प्यारीजी (श्री राधा) प्रियतम (श्री कृष्ण) के साथ रंग (रस-विलास) के हिंडोले पर झूल रही हैं। सुन्दर रंग के वस्त्र धारण किये हुए वे मंद-मंथर गति से झूमती हुई प्रफुल्लित हो रही हैं।
श्री स्वामी सन्मुख भये, महा अभै पद देत - श्री ललितमोहिनी देव, विशिष्ट पद एवं साखी
जब कोई जीव ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के शरणागत होता है, तो वह महा अभय पद को प्राप्त हो जाता है। स्वामीजी उसी क्षण उसे अपना बनाकर, नित्य विहार रस में प्रिया-प्रियतम का अंग-संग प्रदान करते हैं।
हौं हूँ आई देखन स्याम - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (46)
मैं उन श्यामसुन्दर को देखने आई हूँ, जो साँवले सलौने हैं, जिनके नेत्र विशाल हैं और जिन्हें श्री किशोरीजी ने सब प्रकार से पूर्णकाम कर रखा है।
निरनै बस्तु और धर्म को - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (41)
युगल उपासना में वस्तु (श्री श्यामा श्याम) एवं धर्म (रस-रीति) ही सिद्धांत हैं। अन्य उपासनाओं में वेदांत के तर्क ने सब नाश ही कर दिया, क्योंकि वेदांत अर्थात वेद (ज्ञान) का अंत है।
प्रियालाल खेलत बसंतर - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (51)
प्रियाप्रियतम फाग खेल रहे हैं। झाँझ, मृदंग, डफ, वंशी, वीणा और मुहचंग सुन्दर सुरीली तान में बज रहे हैं ।
हौं बूड़न कौं बहु करौं - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (39)
मैं तो इस संसार में डूबना का ही काम कर रहा हूँ, परंतु श्री हरि मुझे डूबने नहीं देते । जब जब मैं इस संसार रूपी कुएँ में गिरने लगता हूँ तब वे मुझे हाथ पकड़कर स्वयं साध लेते हैं ।
जिनहिं देखि हरि देखिये तिनहिं भाव सों देखि - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (11)
जिनके दर्शन करके श्रीहरि के दर्शन मिल पाते हैं, उन श्री गुरुदेव को भी उसी (हरि रूप) से ही देखिये । वे (श्रीहरि) और ये (श्रीगुरुदेव) दोनों एक ही हैं, यह बात सभी आचार्यों ने अपने श्रीमुख से विशेष रूप से, कही है ।
मत्त भये तन-मन न सँभार - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (60)
दिव्य युगल (श्री राधा कृष्ण) नित्यविहार में ऐसे उन्मत्त हो रहे हैं कि उन्हें तन-मन की कोई सुध-बुध ही नहीं रहा है । दोनों ओर अपार आनंद उमड़ रहा है और दोनों एक दूसरे के कंठहार बने हुए हैं ।
सो पापनि कौ मूल है, एकहि पैसा रोक - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (22)
समस्त अनर्थों और पापों का मूल कारण धन का मोह (संग्रह-वृत्ति) ही है। जो जीव लोभ वश धन की गाँठ बाँधता रहता है, उसका श्रीहरि से आत्यंतिक संबंध स्वतः ही विच्छिन्न हो जाता है।
जैसे मेरे जिय में तू बसत है - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (59)
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जैसे मेरे ह्रदय में आप बसी हैं, वैसे ही मैं आपके ह्रदय में बसा हूँ कि नहीं ? आपकी छवि तो अहर्निश मेरे नेत्रों में समाई हुई है । मेरा तो जीवन केवल आप हो, आपके अतिरिक्त अन्य मुझे कुछ भी भाता नहीं ।
करुवा गूदरा अमृती चीपी कठुला माला बाँकी - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (26)
करवा, गुदड़ी, अमृतपात्र, रज का कटोरा, कठला, माला, और बाँकी (वृंदावन की शुष्क लता का एक सर्पाकार छोटा सा दंड) - इन सात वस्तुओं से प्रयोजन रखने वाले हरिदासी संत रंगमहल में प्रिया प्रियतम की अनवरत ललित केली का सदा अवलोकन करते रहते हैं ।