व्यास वाणी
श्री राधा और कृष्ण के प्रेम रस, लीला रस, वृन्दावन रस एवं सिद्धांत से युक्त 'व्यास वाणी' में वर्णित पद एवं दोहे, श्री हरिराम व्यास द्वारा लिखित है। यह श्री विशाखा सखी का अवतार माने जाते हैं।
लेखक: श्री हरिराम व्यास
249 लेख उपलब्ध हैं
गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)
गुण और सौंदर्य की पराकाष्ठा श्री राधिकाजू ने रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण का तन, मन, धन, यौवन, आभूषण और प्राण—सब कुछ उनकी प्राणप्रिया श्रीराधाजी के लिए ही समर्पित है।
व्यास विझूका खेतकौ दुःख न काहू देइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (146)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जैसे खेत में खड़ा बिजूका (पुतला) देखने में भय उत्पन्न करता है, पर वास्तव में वह किसी को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, वैसे ही संसार के भय और बाधाएँ भी केवल भयभीत करती हैं। जो साधक प्रभु पर भरोसा रखकर, सब प्रकार की भय-बाधायों से निःशंक होकर आगे बढ़ता है, वह भक्ति और प्रेम-रस की अपार संपदा प्राप्त करता है।
वन्दौं श्रीराधा-हरिकौ अनुराग तन - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (03)
मैं श्रीराधा और श्रीहरि के दिव्य अनुराग की वंदना करता हूँ। उन दोनों के तन और मन मिलकर एक हो गए हैं जो अनेक लीला-रसों के रंगों से भरे हैं, मानो जैसे राग और रागिनी परस्पर मिलकर एक हो गए हों।
साकत बाँभन जिन मिलौ वैष्णव - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (128)
प्रभु-विमुख (विषयी) ब्राह्मण का संग कदापि नहीं करना चाहिए, उसकी अपेक्षा हरि-भक्त (वैष्णव) चंडाल का संग भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जिसके मिलने से हृदय में परम सुख और आनंद प्राप्त हो, मानो स्वयं श्री गोपाल ही मिल गए हों।
झूठ मसकरी मन लगै हरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)
सांसारिक जीव का मन व्यर्थ की बातों और हँसी-मज़ाक में तो सहज ही लग जाता है, किन्तु श्रीहरि के भजन के समय वह टालमटोल करने लगता है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे जीव की भजन-विमुखता देखकर भक्ति स्वयं पुकारती हुई उनकी देहली से ही लौट जाती है।
राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)
श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।
व्यास वसैं वनखण्डमें करें निरंतर ध्यान - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (139)
यद्यपि कोई साधक वन में एकांत वास करता हो और निरंतर भगवद्-ध्यान में ही मग्न रहता हो, तथापि यदि उसके अंतःकरण में अन्य भक्तों के प्रति लेशमात्र भी अभिमान है, स्वयं को श्रेष्ठ मानने का अहंकार अथवा किसी अन्य भक्त को लघु समझने एवं उनके प्रति ईर्ष्या-द्वेष विद्यमान है, तो उसे भगवान की प्राप्ति सर्वथा असंभव है; क्योंकि प्रभु केवल निरभिमान और निष्कपट भाव से ही प्रकट होते हैं।
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (34)
सांसारिक लोग किसी पारखी की भाँति केवल लाभप्रद वस्तु का ही चयन करते हैं अर्थात् अपने स्वार्थ सिद्धि के अनुसार ही सम्बन्ध जोड़ते हैं। किन्तु नन्दलाल श्रीकृष्ण एक विलक्षण गाहक हैं, जो मुझ जैसे सर्वगुणहीन और दोषपूर्ण जीव को भी निष्काम भाव से अपना लेते हैं। अतः एक अनन्य भक्त के लिए श्री कृष्ण ही एकमात्र सच्चे और परम कृपालु आश्रय हैं।
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)
मैं इस पावन श्री वृन्दावन धाम को त्याग कर कहाँ जाऊँ? मुझ जैसे अधम और तुच्छ प्राणी के लिए श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान नहीं है।
व्यास न व्यापक देखिये निर्गुण परै न जानि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)
श्री हरिराम व्यासजी कहते हैं कि वह परब्रह्म सर्वव्यापक होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देता और निर्गुण होने के कारण बुद्धि की पहुँच से परे है। तब अपने भक्तों के कल्याण और उन्हें रसास्वादन कराने के लिए, वही परम तत्व श्री राधावल्लभ के रूप में साक्षात् प्रकट होकर अवतरित हुआ है।
गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)
हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं।
नर देही द्वारौ खुल्यौ हरि पावन की घात - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)
मानव देह रूपी दुर्लभ अवसर भगवान हरि की प्राप्ति तथा जन्म–मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त होने का खुला हुआ द्वार है। श्री हरिराम व्यास जी सचेत करते हैं कि यदि यह अमूल्य अवसर एक बार हाथ से निकल गया, तो फिर भगवद्-प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती—जैसे वृक्ष से टूटा हुआ पत्ता दोबारा उससे नहीं जुड़ सकता।
झूलत फूलत कुंजविहारी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (321)
निकुंज में कुंजविहारी झूला झूल रहे हैं एवं प्रफुल्लित हो रहे हैं, और दूसरी ओर किशोरवल्लभा, वृषभानु की दुलारी, श्री राधा महारानी विराजमान हैं।
व्यास कुलीननि कोटि मिलि पंडित लाख पचीस - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (16)
यदि करोड़ों उच्च कुलीन जन और लाखों-पचीस विद्वान पंडित भी एकत्र हो जाएँ, तो उन सभी के शीश एकत्र होकर भी उस वृंदावन के स्वपच की चरण-रज की बराबरी नहीं कर सकते जो यद्यपि अत्यंत नीच कुल में उत्पन्न हुआ है, परंतु भगवान का भक्त है ।
अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)
अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते।
आजु बधाई है बरसानैं - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (355)
बरसाना आज बधाइयों से गूंज रहा है — वृषभानु जी के घर कुँवरि किशोरी श्री राधा का अवतरण हुआ है, और समस्त लोकों में मंगलध्वनि गूंज रही है।
श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (288)
हे श्रीराधावल्लभ! आप ही मेरे सच्चे हितैषी हैं। संसार के समस्त रिश्ते केवल तब तक ही साथ देते हैं जब तक उनका स्वयं का कोई स्वार्थ जुड़ा हो।
व्यासहि बॉमन जिनि गनौं हरिभक्तन कौ दास - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (14)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं “मुझे ब्राह्मण मत गिनो, मैं तो हरिभक्तों का दास हूँ”। श्रीराधावल्लभ लाल जी के प्रेम में, संसार के समस्त ताने और उपहास को मैंने विभोर होकर ग्रहण किया है ।
मन रति वृंदावन सौ कीजै - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (24)
हे मन, श्री वृन्दावन से प्रेम कर — तू अब तक केवल इंद्रिय-सुखों में पशुवत जीवन जीता रहा है, अब जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त कर।
व्यास राधिका-रवन बिनु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (31)
श्री राधिका रमण युगल सरकार, जो सबके मूल स्रोत हैं, उनके बिना मुझे कहीं भी सच्चा आनंद प्राप्त नहीं हुआ। संसार की प्रत्येक डाल-डाल पर भटकते-भटकते मैं उलझ गया और हर पत्ते ने मुझे केवल दुःख ही दिया।